Mother’s Day Special:पति की मौत के बाद टूटीं, गहने गिरवी रख शुरू किया काम; संघर्ष के दम पर बेटी को ब्रिटेन तक पढ़ाया

ब्रजेंद्र वर्मा, भोपाल। पति की अचानक मौत किसी भी परिवार को भीतर तक तोड़ देती है। लेकिन भोपाल की रहने वाली शम्मी ने इस दर्द को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। पति के निधन के बाद वह पूरी तरह टूट गई थीं, रिश्तेदारों ने भी दूरी बना ली थी लेकिन बेटी के भविष्य ने उन्हें फिर खड़ा होने की ताकत दी। शून्य से शुरुआत कर उन्होंने न सिर्फ खुद को संभाला बल्कि संघर्ष और मेहनत के दम पर बेटी को इंजीनियर बनाया और फिर उच्च शिक्षा के लिए ब्रिटेन तक भेजा।

2016 में पति की मौत के बाद बदल गई जिंदगी
साल 2015 तक शम्मी की जिंदगी सामान्य तरीके से चल रही थी। उनकी बेटी वैष्णवी भोपाल के अयोध्या बायपास स्थित सेंट थॉमस स्कूल में 12वीं की पढ़ाई कर रही थी। इसी दौरान अचानक बीमारी के चलते उनके पति हरीश की तबीयत बिगड़ गई। इलाज के दौरान वर्ष 2016 में तिरुवनंतपुरम में उनका निधन हो गया। हरीश बीएमएचआरसी में स्टाफ सप्लाई का काम करते थे। उनके जाने के बाद यह काम भी बंद हो गया। पति की मौत के बाद शम्मी पूरी तरह टूट गईं। एक तरफ पति को खोने का गहरा दुख था, दूसरी ओर बेटी की पढ़ाई और भविष्य की चिंता उन्हें अंदर ही अंदर खाए जा रही थी। हालात ऐसे हो गए कि रिश्तेदारों और परिचितों ने भी दूरी बनाना शुरू कर दी।
एक साल तक गम में डूबी रहीं मां-बेटी
पति के निधन के बाद शम्मी अपनी बेटी के साथ दक्षिण भारत स्थित अपने गृह जिले तिरुवनंतपुरम चली गईं। करीब एक साल तक दोनों मां-बेटी सदमे में रहीं। बेटी ने भी पढ़ाई से दूरी बना ली थी। लेकिन धीरे-धीरे शम्मी ने खुद को संभाला। उन्हें एहसास हुआ कि अब बेटी का भविष्य ही उनकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।
गहने गिरवी रखकर लिया लोन
पति के जाने के बाद शम्मी ने शून्य से नई शुरुआत की। उन्होंने अपने सोने के गहने गिरवी रखकर लोन लिया और तय किया कि पति ने भोपाल में जिस काम की शुरुआत की थी उसे बंद नहीं होने देंगी। उन्होंने जीके कंस्ट्रक्शन के नाम से काम शुरू किया और भेल क्षेत्र के कस्तूरबा अस्पताल में नर्सिंग और पैरामेडिकल स्टाफ उपलब्ध कराने का कॉन्ट्रेक्ट लेने की कोशिश की।
एक गृहिणी यह काम कैसे करेगी?
शुरुआत आसान नहीं थी। कई अधिकारियों ने यह कहकर मना कर दिया कि एक गृहिणी इस तरह का काम कैसे संभाल पाएगी। लेकिन शम्मी ने हार नहीं मानी। वह बहुत कम पैसों में काम करने के लिए तैयार हो गईं जबकि दूसरी एजेंसियों ने यह काम करने से इनकार कर दिया था। उनकी मेहनत और लगन देखकर आखिरकार भेल प्रबंधन ने उन्हें मौका दिया। यहीं से उनकी जिंदगी ने नया मोड़ लिया।
दिन में 16 घंटे काम कर खड़ी की कंपनी
शम्मी ने एक मां और एक व्यवसायी दोनों जिम्मेदारियां साथ निभाईं। वह हर दिन 15 से 16 घंटे तक काम करती रहीं। धीरे-धीरे उनका काम बढ़ने लगा और जीके कंस्ट्रक्शन ने अपनी पहचान बना ली। संघर्ष के बीच उन्होंने अपनी बेटी की पढ़ाई कभी नहीं रुकने दी।
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पुणे से बीटेक, फिर ब्रिटेन भेजा
पैसे बचाकर उन्होंने बेटी वैष्णवी का दाखिला पुणे के सिम्बोयोसिस में सिविल इंजीनियरिंग (बीटेक) के लिए कराया। बेटी के दूर जाने का दुख जरूर था लेकिन उन्होंने हमेशा उसके करियर को प्राथमिकता दी। इस दौरान उन्होंने दूसरी शादी के बारे में कभी नहीं सोचा और अकेले ही संघर्ष करती रहीं। बाद में लोन लेकर उन्होंने बेटी को ब्रिटेन के ब्रिस्टो विश्वविद्यालय भेजा जहां उसने अर्थक्वेक इंजीनियरिंग में एमएससी की पढ़ाई की। अब वैष्णवी पीएचडी की तैयारी कर रही है और अपनी मां के व्यवसाय में भी सहयोग कर रही है।
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आज कंपनी में 250 कर्मचारी
आज शम्मी की कंपनी जीके कंस्ट्रक्शन में करीब 250 कर्मचारी काम करते हैं। उनकी कंपनी भेल की भोपाल और हरिद्वार यूनिट के अस्पतालों में नर्सिंग और पैरामेडिकल स्टाफ उपलब्ध कराती है। पति को खोने के बाद जिस महिला ने गहने गिरवी रखकर संघर्ष शुरू किया था, आज वही महिला कई लोगों को रोजगार दे रही है। उनकी कहानी सिर्फ एक मां के संघर्ष की नहीं बल्कि हिम्मत, आत्मविश्वास और जिम्मेदारी की मिसाल बन चुकी है।












