Mother's Day Special :मौत के मुहाने से बच्चों को खींच लाई मां, खुद बन गई जिंदगी की डोर

प्रवीण श्रीवास्तव, भोपाल। 'चलती फिरती आंखों से अजां देखी है, मैंने जन्नत तो नहीं देखी है, मां देखी है।' मुनव्वर राणा की ये पंक्तियां मां के प्यार को बयां करती हैं। आज मदर्स डे है। इस अवसर पर अक्सर मां के प्यार और त्याग की बातें होती हैं, लेकिन कुछ माताएं ऐसी भी हैं, जिन्होंने अपने शरीर का हिस्सा देकर बच्चों को दूसरी जिंदगी दी। एम्स भोपाल में पिछले तीन साल में हुए 17 किडनी ट्रांसप्लांट सिर्फ चिकित्सा उपलब्धि नहीं, बल्कि ममता की सबसे बड़ी मिसाल बनकर सामने आए हैं। इन मामलों में 7 बार मां खुद ऑपरेशन टेबल पर लेटी और अपनी किडनी देकर बच्चों को मौत के मुहाने से वापस खींच लाई। इस मदर्स डे पर कुछ कहानियां बताती हैं कि मां सिर्फ जन्म नहीं देती, बल्कि जरूरत पड़े तो अपनी जिंदगी का हिस्सा देकर अपने बच्चे को फिर से जीना सिखाती है।
बेटे को जिंदगी का सबसे बड़ा तोहफा

दमोह की 52 वर्षीय उषा चौरसिया के लिए यह मदर्स डे कभी न भूलने वाला बन गया। उनका बेटा आदर्श किडनी फेलियर से जूझ रहा था। डॉक्टरों ने ट्रांसप्लांट की सलाह दी तो उषा ने बिना देर किए अपनी किडनी देने का फैसला किया। ऑपरेशन से पहले उन्होंने बेटे से कहा, बेटा डर मत, मैं तेरे साथ हूं... मैं तुझे फिर जिंदगी दूंगी। सफल ऑपरेशन के बाद आदर्श तेजी से ठीक हो रहा है। उषा कहती हैं कि मां के लिए सबसे बड़ा सुख अपने बच्चे को सुरक्षित देखना होता है।
मेरी सांसें अब उसमें भी चलती हैं
बैतूल की फूलबाई के 25 वर्षीय बेटे की हालत लगातार बिगड़ रही थी। परिवार उम्मीद खो चुका था, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। टेस्ट में पिता और बड़े भाई का ब्लड भी मैच हुआ, लेकिन फूलबाई ने अपनी किडनी देकर बेटे को नई जिंदगी दी। ऑपरेशन के बाद उन्होंने कहा, ‘अब मुझे लगता है कि मेरी सांसें उसमें भी चल रही हैं।’ बेटा आज स्वस्थ है और सामान्य जीवन जी रहा है।
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बेटी की मुस्कान ही सबसे बड़ा गिफ्ट
भोपाल की नीलम के लिए यह मदर्स डे उनकी जिंदगी का सबसे खास दिन है। उनकी 21 साल की बेटी की किडनी फेल हो चुकी थी। नीलम ने हिम्मत नहीं हारी और अपनी किडनी देने का फैसला लिया। ऑपरेशन के बाद बेटी की मुस्कान देखकर नीलम भावुक हो गईं। उन्होंने कहा, ‘मुझे कोई गिफ्ट नहीं चाहिए, मेरी बेटी की मुस्कान ही सब कुछ है।’
पीपुल्स समाचार नॉलेज : अंगदान में भी मां और महिलाएं सबसे आगे
अस्पतालों से मिली जानकारी के मुताबिक पिछले चार साल में प्रदेश में करीब 375 ऑर्गन ट्रांसप्लांट हुए हैं। इनमें सबसे ज्यादा 292 प्रत्यारोपण बंसल अस्पताल में किए गए। यहां 156 महिलाओं ने अंगदान किया, जबकि पुरुष डोनर सिर्फ 36 रहे। आंकड़ों के अनुसार 56 फीसदी डोनर पत्नियां और 28 फीसदी मांएं हैं।
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जरूरत लाखों को, डोनर अब भी बहुत कम
देश में हर साल करीब 2 लाख लोगों को किडनी ट्रांसप्लांट की जरूरत पड़ती है, लेकिन सिर्फ 8 से 10 हजार मरीजों का ही प्रत्यारोपण हो पाता है। करीब 80 हजार लोगों को लिवर ट्रांसप्लांट की जरूरत होती है, जबकि सिर्फ 1800 मरीजों तक इलाज पहुंच पाता है।
इतनी है जरूरत
देश में हर साल करीब 70 लाख लोग रक्तदान करते हैं, लेकिन अंगदान करने वालों की संख्या सिर्फ 700 के आसपास है। भारत में प्रति दस लाख आबादी पर सिर्फ 0.65 लोग अंगदान करते हैं, जबकि स्पेन में यह आंकड़ा 35 है। दक्षिण भारत के राज्य अंगदान के मामले में सबसे ज्यादा जागरूक माने जाते हैं। 2024 में मृत डोनर ट्रांसप्लांट में तमिलनाडु शीर्ष पर रहा, जबकि मध्यप्रदेश में 108 ट्रांसप्लांट हुए।
2024 में मृत डोनर ऑर्गन ट्रांसप्लांट में टॉप राज्य
- तमिलनाडु : 860
- तेलंगाना : 587
- कर्नाटक : 483
- महाराष्ट्र : 466
- गुजरात : 367
- मध्यप्रदेश : 108
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2024 में जीवित डोनर ट्रांसप्लांट-टॉप राज्य
- दिल्ली एनसीआर : 4357
- तमिलनाडु : 1987
- महाराष्ट्र : 1607
- केरल : 1471
- पश्चिम बंगाल : 996
- मध्यप्रदेश : 348
देश में कुल ट्रांसप्लांट
- 2020 : 7443
- 2021 : 12259
- 2022 : 16041
- 2023 : 18878
- 2024 : 18911












