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Mother’s Day Special:जिन बच्चों को जीना सिखाया, उन्होंने ही सड़कों पर छोड़ा; फिर भी मांओं के दिल से बच्चों के लिए दुआएं ही निकलीं

भोपाल के वृद्धाश्रमों में रह रहीं कई मांओं की कहानियां पीड़ा से भरी हैं। जिन्होंने बच्चों को पढ़ाया-लिखाया, काबिल बनाया लेकिन बदले में उन्हें मिला अकेलापन, अपमान और बेघर होने का दर्द।
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जिन बच्चों को जीना सिखाया, उन्होंने ही सड़कों पर छोड़ा; फिर भी मांओं के दिल से बच्चों के लिए दुआएं ही निकलीं
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पल्लवी वाघेला, भोपाल। मां अपने बच्चों को सिर्फ जन्म नहीं देती बल्कि उन्हें जीना भी सिखाती है। अपने हिस्से की खुशियां, सपने और पूरी जिंदगी बच्चों के नाम कर देती है। लेकिन जब वही बच्चे उम्र के आखिरी पड़ाव पर माता-पिता को अकेला छोड़ देते हैं तब सबसे ज्यादा टूटती है एक मां। भोपाल के वृद्धाश्रमों में रह रहीं कई मांओं की कहानियां ऐसी ही पीड़ा से भरी हैं। जिन्होंने बच्चों को पढ़ाया-लिखाया, काबिल बनाया लेकिन बदले में उन्हें मिला अकेलापन, अपमान और बेघर होने का दर्द। फिर भी इन मांओं की आंखों में शिकायत कम और बच्चों के लिए दुआएं ज्यादा दिखाई देती हैं।

अधिकारी पति की मौत के बाद बदल गई पूरी जिंदगी

72 वर्षीय चंद्रा रानी सक्सेना कभी सम्मान और खुशहाल जीवन जीती थीं। उनके पति मध्यप्रदेश शासन के मत्स्य पालन विभाग में डायरेक्टर थे। वहीं वह खुद प्रसिद्ध रंगकर्मी बाबा कारंत की टीम से जुड़ी थिएटर आर्टिस्ट और आकाशवाणी की एंकर रही हैं।

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भोपाल के जवाहर चौक स्थित दो मंजिला घर में रहने वाली चंद्रा दादी ने अपने दोनों बेटों को अच्छी शिक्षा और संस्कार दिए। एक बेटा अधिकारी बना तो दूसरा इंजीनियर। लेकिन पति की मौत के बाद उनकी जिंदगी पूरी तरह बदल गई। वह बताती हैं कि वर्ष 2004 में पति के निधन के बाद दोनों बेटों ने अलग-अलग घर कर लिए। बड़ा बेटा उन्हें अपने साथ ले गया लेकिन वहां उन्हें सम्मान नहीं मिला। मुझे घर के एक कमरे में कबाड़ की तरह डाल दिया गया था। किसी मेहमान के आने पर बाहर निकलने तक की इजाजत नहीं थी। यह अपमान धीरे-धीरे भीतर से तोड़ रहा था।

बेटों के कई मकान, लेकिन मां के लिए जगह नहीं

चंद्रा दादी की आवाज भर्रा जाती है जब वह अपने अकेलेपन का जिक्र करती हैं। मेरे बेटों के भोपाल में चार-चार घर हैं लेकिन मां के लिए कहीं जगह नहीं बची। आखिर मैंने अपने आत्मसम्मान के लिए 2015 में खुद वृद्धाश्रम आने का फैसला किया। उन्होंने बताया कि जब उन्होंने बेटों को फोन कर वृद्धाश्रम जाने की जानकारी दी तो जवाब मिला- वहां अच्छे से रहना। उसके बाद किसी ने पलटकर हाल तक नहीं पूछा। दर्द तब और बढ़ गया जब उन्हें अपने ही बेटे की मौत की खबर अखबार के एक कॉलम से मिली।

शादी के बाद भी नहीं छोड़ी पढ़ाई और थिएटर

कम उम्र में शादी होने के बावजूद चंद्रा दादी ने पढ़ाई जारी रखी। पति और ससुर के सहयोग से उन्होंने सोशियोलॉजी और इकोनॉमिक्स में एमए किया। पीएचडी की थीसिस लिखने के दौरान वह थिएटर से जुड़ीं और हिंदी से लेकर अंग्रेजी तक कई नाटकों में अभिनय किया। उन्हें तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह से सम्मान भी मिला था। परिवार और करियर दोनों जिम्मेदारियां उन्होंने पूरी ईमानदारी से निभाईं लेकिन बुढ़ापे में उन्हें अकेलापन मिला।

यहां बच्चे मुझे दादी कहकर बुलाते हैं

वृद्धाश्रम आने के बाद उनका घुटने का ऑपरेशन हुआ और धीरे-धीरे उन्होंने यहां अपनी नई दुनिया बना ली। यहां आने वाले बच्चे मुझे दादी कहते हैं। अब यही मेरा परिवार है। बस एक सवाल हमेशा मन में रहता है कि आखिर अपने बुजुर्ग माता-पिता के साथ रहने में बच्चों को शर्म क्यों महसूस होती है।

आंखों की रोशनी गई तो बेटों ने घर से निकाला

78 वर्षीय रजनी की कहानी भी बेहद दर्दनाक है। एक सिंगल मदर के रूप में उन्होंने अपने दोनों बेटों की परवरिश की। जिंदगीभर संघर्ष कर बच्चों को खड़ा किया लेकिन जब उम्र बढ़ी और आंखों की रोशनी कम होने लगी तो वही मां बच्चों के लिए बोझ बन गई।

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रजनी दादी बताती हैं कि बेटों ने उन्हें घर से बाहर निकाल दिया। अगस्त का महीना था। लगातार बारिश हो रही थी। मैं पांच दिन तक सड़क पर पड़ी रही। पूरे शरीर और बालों में कीड़े पड़ गए थे। बारिश में भीगने से दोनों पैर गल गए थे।

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किसी अनजान शख्स ने बचाई जान

वह बताती हैं कि शुरुआत में किसी तरह सहारा लेकर चल लेती थीं लेकिन पैरों की हालत बिगड़ने के बाद उठना तक मुश्किल हो गया। एक भले आदमी ने पुलिस को फोन किया। इसके बाद मुझे वृद्धाश्रम लाया गया। यहां आकर लगा जैसे भगवान ने मुझे दूसरी जिंदगी दे दी। करीब दो महीने तक इलाज चला, तब जाकर उनके घाव ठीक हो पाए।

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बच्चों से शिकायत नहीं, बस खुश रहें

इतनी पीड़ा झेलने के बाद भी रजनी दादी के दिल में अपने बच्चों के लिए नाराजगी नहीं है। अब तो यही आश्रम मेरा घर है। बच्चों से क्या शिकायत करूं… जहां रहें बस खुश रहें।

इन मांओं की कहानियां सिर्फ व्यक्तिगत दर्द नहीं हैं बल्कि समाज के बदलते चेहरे की ऐसी तस्वीर हैं जहां भागदौड़ और आधुनिक जीवनशैली के बीच रिश्तों की गर्माहट धीरे-धीरे कम होती जा रही है।

Sumit Shrivastava
By Sumit Shrivastava

सुमित श्रीवास्तव एक अनुभवी मीडिया प्रोफेशनल, बिजनेस पत्रकार और शोधकर्ता हैं। मास कम्युनिकेशन में M.P...Read More

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