सतपुड़ा टाइगर रिजर्व में बाघ आकलन-2026 की तैयारी तेज, 36 वनकर्मियों को दिया गया विशेष प्रशिक्षण
सोहागपुर। अखिल भारतीय बाघ आकलन-2026 की तैयारियों के तहत सतपुड़ा टाइगर रिजर्व में मैदानी वन अमले को प्रशिक्षित करने का काम तेज कर दिया गया है। इसी क्रम में चूरना वन परिक्षेत्र के भीमकुंड पर्यटन द्वार स्थित तवा सभागार में विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसमें वनवृत्त बैतूल एवं होशंगाबाद और रामपुर-भतौड़ी प्रोजेक्ट, बैतूल के कुल 36 वनकर्मियों ने हिस्सा लिया। सतपुड़ा टाइगर रिजर्व के जनसंपर्क अधिकारी एवं सहायक संचालक आशीष खोबरागड़े ने बताया कि प्रशिक्षण का मुख्य उद्देश्य बाघों की मौजूदगी से जुड़े अप्रत्यक्ष साक्ष्यों का वैज्ञानिक तरीके से संकलन करना और मैदानी स्तर पर जुटाए जाने वाले आंकड़ों की शुद्धता एवं विश्वसनीयता सुनिश्चित करना था। इस दौरान प्रतिभागियों को अखिल भारतीय बाघ आकलन के लिए निर्धारित वैज्ञानिक प्रक्रियाओं की विस्तार से जानकारी दी गई।
बाघों की मौजूदगी से जुड़े साक्ष्य जुटाने की दी गई जानकारी
प्रशिक्षण कार्यक्रम में वनकर्मियों को बाघों की उपस्थिति से संबंधित अप्रत्यक्ष साक्ष्यों के संकलन और उनके व्यवस्थित अभिलेखीकरण के तरीके समझाए गए। साथ ही आंकड़ों की गुणवत्ता बनाए रखने से जुड़े तकनीकी पहलुओं पर भी जानकारी दी गई। वनकर्मियों को मैदानी सर्वेक्षण के दौरान निर्धारित प्रोटोकॉल का पालन करने और त्रुटिरहित आंकड़ा संधारण के लिए व्यावहारिक मार्गदर्शन दिया गया। विशेषज्ञों ने बताया कि प्रत्येक साक्ष्य का रिकॉर्ड तय वैज्ञानिक प्रक्रिया के अनुसार तैयार करना जरूरी है, ताकि आकलन के दौरान आंकड़ों की विश्वसनीयता बनी रहे।
वन्यजीव विशेषज्ञों ने दिया प्रशिक्षण
इस अवसर पर वन्यजीव विशेषज्ञ कर्मचारी वनपाल राजेश पटेल, वनपाल विजय कुमार बामने, वनरक्षक अनिल कुमार शाक्य और वनरक्षक अमित कौरव ने प्रशिक्षण प्रदान किया। विशेषज्ञों ने मैदानी कार्य के दौरान वैज्ञानिक पद्धति अपनाने और निर्धारित मानकों के अनुसार साक्ष्यों का रिकॉर्ड तैयार करने के महत्व को समझाया।
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बाघों की संख्या और भौगोलिक वितरण का होगा वैज्ञानिक आकलन
उल्लेखनीय है कि अखिल भारतीय बाघ आकलन देश में बाघों की संख्या, उनकी स्थिति और भौगोलिक वितरण का वैज्ञानिक मूल्यांकन करने की महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। इसके जरिए बाघ संरक्षण के लिए किए जा रहे प्रयासों का भी आकलन किया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में प्रशिक्षित मैदानी वन अमले की भूमिका महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि आकलन के लिए जुटाए गए आंकड़ों की विश्वसनीयता ही इसके परिणामों का प्रमुख आधार होती है।























