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छत्तीसगढ़ का बहुचर्चित साड़ी घोटाला जांच फाइलों में दफन! आखिर किसे बचाने में जुटा महिला एवं बाल विकास विभाग?

साड़ी सप्लाई से पहले गुणवत्ता परीक्षण की जिम्मेदारी मुंबई की राइट्स लिमिटेड को सौंपी गई थी। एजेंसी की रिपोर्ट के आधार पर ही सप्लाई को हरी झंडी मिली थी। अब सवाल यह उठ रहा है कि यदि बाद में साड़ियों में खामियां मिलीं तो क्या जांच एजेंसी ने गलत रिपोर्ट दी थी या फिर वास्तविक रिपोर्ट को दबाया गया? हैरानी की बात यह है कि अब तक न तो जांच एजेंसी की जवाबदेही तय हुई है और न ही उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक की गई
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छत्तीसगढ़ का बहुचर्चित साड़ी घोटाला जांच फाइलों में दफन! आखिर किसे बचाने में जुटा महिला एवं बाल विकास विभाग?
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रायपुर। छत्तीसगढ़ में महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा लगभग 9.7 करोड़ रुपये की साड़ी खरीदी में सामने आई अनियमितताओं की जांच अब खुद सवालों के घेरे में है। विभागीय जांच में सात जिलों में सप्लाई की गई साड़ियों में गड़बड़ी की पुष्टि होने के बावजूद दो महीने बाद भी न जांच रिपोर्ट सार्वजनिक हुई है और न ही किसी जिम्मेदार अधिकारी, सप्लायर या जांच एजेंसी पर कार्रवाई की गई है। इस पूरे मामले में विभाग की चुप्पी और जांच की धीमी रफ्तार ने कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं।

सात जिलों में गड़बड़ी की पुष्टि, फिर भी कार्रवाई नहीं

महिला एवं बाल विकास विभाग ने खुद स्वीकार किया है कि सात जिलों में वितरित साड़ियों में गुणवत्ता और मापदंड संबंधी गंभीर खामियां पाई गईं। निर्धारित 6.3 मीटर लंबाई की साड़ियां कई जगहों पर केवल 5 मीटर तक ही निकलीं। इसके अलावा कपड़े की गुणवत्ता, रंग छोड़ने, धागे निकलने और कपड़े के अत्यधिक पतले होने की शिकायतें भी सामने आईं। मामला उजागर होने के बाद विभाग ने जांच समिति गठित की और मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े ने भुगतान रोकने तथा खराब साड़ियों को बदलने के निर्देश भी दिए थे। जांच समिति ने प्राथमिक जांच में गड़बड़ी की पुष्टि कर दी, लेकिन इसके बाद पूरा मामला ठंडे बस्ते में जाता दिखाई दे रहा है।

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9.7 करोड़ के भुगतान पर उठ रहे सवाल

सूत्रों के अनुसार साड़ी खरीदी का भुगतान भी लगभग पूरा किया जा चुका है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि गुणवत्ता और मापदंडों में कमी की पुष्टि हो चुकी थी तो भुगतान किस आधार पर किया गया? क्या संबंधित अधिकारियों ने नियमों की अनदेखी की या फिर सप्लायर को लाभ पहुंचाने के लिए प्रक्रिया में समझौता किया गया?

जांच एजेंसी की भूमिका भी संदेह के घेरे में

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साड़ी सप्लाई से पहले गुणवत्ता परीक्षण की जिम्मेदारी मुंबई की राइट्स लिमिटेड को सौंपी गई थी। एजेंसी की रिपोर्ट के आधार पर ही सप्लाई को हरी झंडी मिली थी। अब सवाल यह उठ रहा है कि यदि बाद में साड़ियों में खामियां मिलीं तो क्या जांच एजेंसी ने गलत रिपोर्ट दी थी या फिर वास्तविक रिपोर्ट को दबाया गया? हैरानी की बात यह है कि अब तक न तो जांच एजेंसी की जवाबदेही तय हुई है और न ही उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक की गई है।

कर्मचारियों को मीडिया से दूर रहने की चेतावनी

मामले का एक और गंभीर पहलू यह सामने आया कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं को मीडिया से बात नहीं करने के निर्देश दिए गए। व्हाट्सएप ग्रुपों में संदेश प्रसारित कर कर्मचारियों को चेतावनी दी गई कि वे मामले पर कोई सार्वजनिक टिप्पणी न करें। यदि विभाग पूरी पारदर्शिता के साथ जांच कर रहा है तो फिर कर्मचारियों को चुप रहने के निर्देश क्यों दिए गए? यह सवाल भी अब चर्चा का विषय बन चुका है।

साड़ियां वापस गईं, नई अब तक नहीं पहुंचीं

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गुणवत्ता संबंधी शिकायतों के बाद कई स्थानों से खराब साड़ियां वापस ले ली गईं, लेकिन दो महीने बाद भी बड़ी संख्या में आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को नई साड़ियां नहीं मिल सकी हैं। नतीजतन कार्यकर्ता न पुरानी साड़ी का उपयोग कर पा रही हैं और न ही नई साड़ी उन्हें उपलब्ध कराई गई है।

क्या सिर्फ रिप्लेसमेंट से खत्म हो जाएगी जिम्मेदारी?

विभाग लगातार यह कह रहा है कि जहां शिकायतें मिली हैं वहां नई साड़ियां उपलब्ध कराई जाएंगी। लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ साड़ियों को बदल देना ही पर्याप्त कार्रवाई है? यदि करोड़ों रुपये की खरीदी में निर्धारित मापदंडों का उल्लंघन हुआ है तो इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों, सप्लायर और गुणवत्ता परीक्षण एजेंसियों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।

कमीशनखोरी और प्रभावशाली लोगों की भूमिका पर चर्चा

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विभागीय गलियारों में इस पूरे मामले को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं हैं। आरोप लगाए जा रहे हैं कि खरीदी प्रक्रिया में प्रभावशाली लोगों का हस्तक्षेप था और सप्लाई चेन में कुछ रसूखदार व्यक्तियों की भूमिका भी रही। हालांकि इन आरोपों की अभी तक आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन जांच की धीमी रफ्तार ने संदेह को और मजबूत कर दिया है।

सबसे बड़ा सवाल: आखिर किसे बचाया जा रहा है?

दो महीने से अधिक समय बीत जाने के बावजूद न जांच रिपोर्ट सार्वजनिक हुई, न वित्तीय अनियमितताओं पर कोई निष्कर्ष सामने आया और न ही किसी अधिकारी या एजेंसी के खिलाफ कार्रवाई हुई। सात जिलों में गड़बड़ी की पुष्टि होने के बाद भी विभाग केवल "जांच जारी है" कहकर मामला टालता नजर आ रहा है।

Prem Nirmalkar
By Prem Nirmalkar
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