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बरसते मेघ, गूंजते वेदमंत्र, बेबस नदी तट पर पांच घंटे चला श्रावणी उपाकर्म का दिव्य अनुष्ठान

सागर के चितौरा घाट पर श्रावण पूर्णिमा के अवसर पर लगातार बारिश के बीच ब्राह्मण समाज के विद्वानों ने पांच घंटे तक श्रावणी उपाकर्म का वैदिक अनुष्ठान किया। जल में खड़े होकर प्रायश्चित, दशविध स्नान, तर्पण, हवन और पूजन के बाद नवीन यज्ञोपवीत धारण कराया गया। आयोजन का उद्देश्य ऋषि परंपरा और वैदिक संस्कारों को जीवंत रखना रहा।
सागर। ब्राह्मण समाज के विद्वान, पुरोहित और धर्माचार्यों ने पांच घंटे तक श्रावणी उपाकर्म अनुष्ठान किए।

सागर। आसमान से लगातार बरसती फुहारें, बेबस नदी का कल-कल बहता जल, चितौरा घाट पर कटि-पर्यंत जल में खड़े विद्वानों का समूह और वातावरण में गूंजते वैदिक मंत्र। श्रावण पूर्णिमा पर सागर जिले के चितौरा घाट का दृश्य किसी प्राचीन वैदिक युग की झलक प्रस्तुत कर रहा था। जहां एक ओर लोग लगातार हो रही बारिश के कारण घरों में रहने को मजबूर थे, वहीं दूसरी ओर ब्राह्मण समाज के विद्वान, पुरोहित और धर्माचार्य पांच घंटे तक वर्षा में भीगते हुए श्रावणी उपाकर्म का पवित्र अनुष्ठान संपन्न कर रहे थे। सनातन धर्म में श्रावण पूर्णिमा का विशेष महत्व माना गया है। वैदिक परंपरा के अनुसार यह दिन ऋषियों के स्मरण, आत्मशुद्धि, प्रायश्चित और आध्यात्मिक ऊर्जा के पुनर्संचय का पर्व है। इसी परंपरा के निर्वहन के लिए सागर सहित आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में विद्वान और ब्राह्मण समाज के लोग बेबस नदी के तट पर एकत्र हुए।

चार वर्ण, चार पर्व और श्रावणी का विशेष महत्व

धर्मशास्त्रों में वर्णित मान्यताओं के अनुसार सनातन व्यवस्था में चार प्रमुख पर्वों को चार वर्णों से जोड़ा गया है। श्रावणी ब्राह्मणों का, दशहरा क्षत्रियों का, दीपावली वैश्यों का और होली शूद्र वर्ण का प्रमुख पर्व माना जाता है। श्रावणी उपाकर्म को ब्राह्मणों के आध्यात्मिक तेज, तप और वैदिक संस्कारों के पुनर्जागरण का अवसर माना जाता है। विद्वानों के अनुसार वर्ष भर यज्ञ, पूजा, संस्कार, कथा, प्रवचन और आशीर्वाद जैसे धार्मिक कार्य करते हुए ब्राह्मण समाज लोककल्याण में अपना आध्यात्मिक तेज समर्पित करता है। श्रावणी उपाकर्म उसी तेज के पुनः जागरण और ऋषियों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का वैदिक विधान है।

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प्रायश्चित से हुआ अनुष्ठान का शुभारंभ

वयोवृद्ध पुरोहित एवं पुजारी विद्वत संघ के संभागीय अध्यक्ष पं. राजेंद्र प्रसाद पाण्डेय (सानौधा) के निर्देशन  और पं. रामेश्वर प्रसाद तिवारी (बंडा)  के आचार्यत्व में अनुष्ठान प्रारंभ हुआ। सबसे पहले प्रायश्चित एवं हेमाद्रि संकल्प कराया गया। लगभग एक घंटे तक चले इस संकल्प में वर्ष भर में जाने-अनजाने हुए दोषों, त्रुटियों और पापों के शमन की कामना की गई। वैदिक मंत्रोच्चार के बीच उपस्थित श्रद्धालुओं ने आत्मशुद्धि और लोककल्याण का संकल्प लिया।

दशविध स्नान  पंचगव्य पान का वैदिक विधान

 पुरोहित-पुजारी विद्वत संघ  अध्यक्ष पं. शिवप्रसाद तिवारी ने बताया कि संकल्प के बाद बाह्य और आंतरिक शुद्धि की प्रक्रिया संपन्न कराई गई। इसमें सभी प्रतिभागियों ने दशविध स्नान और  पंचगव्य पान किया। वैदिक परंपरा में दशविध स्नान में गाय का दूध, दही, घी, भस्म, गोबर, मृतिका, दूर्वोदक, कुशोदक, स्वर्णोदक, गोमूत्र और तीर्थजल का विशेष महत्व बताया गया है। वहीं पंचगव्य में दूध, दही, घी, गोबर और गोमूत्र का धार्मिक रूप से सेवन कर आत्मशुद्धि का विधान किया जाता है।

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जल में खड़े होकर किया देव, ऋषि और पितृ तर्प

बारिश के बीच विद्वान जल में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते नजर आए। इसके बाद देव तर्पण, ऋषि तर्पण और पितृ तर्पण की विधि संपन्न की गई।
 वरिष्ठ विद्वानbडॉ. देवेंद्र गुरु  ने बताया कि तर्पण केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं बल्कि ऋषियों, देवताओं और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का माध्यम है। इससे आध्यात्मिक ऊर्जा, मानसिक शांति और सकारात्मकता प्राप्त होती है।

क्यों आवश्यक है श्रावणी उपाकर्म?

धर्माधिकारी पं. बृजेश  महाराज ने कहा कि ब्राह्मण समाज वर्ष भर धार्मिक अनुष्ठानों और आशीर्वाद के माध्यम से समाज का मार्गदर्शन करता है। इस प्रक्रिया में उसका आध्यात्मिक तेज निरंतर लोककल्याण में समर्पित होता रहता है। इसी तेज के पुनर्संचय के लिए ऋषियों ने उपाकर्म की परंपरा स्थापित की। गौपीठाधीश्वर पं. विपिन बिहारी दास ने बताया कि कथा-वाचन, प्रवचन और धार्मिक मार्गदर्शन करने वालों के लिए भी यह अनुष्ठान अत्यंत आवश्यक माना गया है। इससे वाणी, विचार और कर्म की शुद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है।

हवन, पूजन और नवीन यज्ञोपवीत धारण 

दशविध स्नान और तर्पण के बाद गौरी-गणेश, भगवान विष्णु एवं सप्तऋषियों का षोडशोपचार पूजन किया गया। इसके पश्चात वैदिक विधि से हवन संपन्न हुआ, जिसमें देवताओं और ऋषियों के नाम पर आहुतियां अर्पित की गईं। ज्योतिष प्रकोष्ठ  सचिव पं. बलराम भारद्वाज ने नवीन यज्ञोपवीत (जनेऊ) में देवताओं एवं ऋषियों का आवाहन कर सभी ब्राह्मणों को नया यज्ञोपवीत धारण कराया। अंत में आरती, देव विसर्जन और प्रसाद वितरण के साथ कार्यक्रम संपन्न हुआ।

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ऋषि परंपरा को जीवंत रखने का संकल्प

युवा ब्राह्मण समाज के अध्यक्ष पं. भरत तिवारी ने बताया कि पिछले कई वर्षों से श्रावणी उपाकर्म सामूहिक रूप से आयोजित किया जा रहा है। इसका उद्देश्य नई पीढ़ी को वैदिक संस्कारों और ऋषि परंपरा से जोड़ना है। उन्होंने कहा कि आधुनिकता के दौर में भी ऐसे आयोजन सनातन संस्कृति की जड़ों को मजबूत करने का कार्य कर रहे हैं।

विद्वानों और समाजजनों की रही उल्लेखनीय उपस्थिति

कार्यक्रम में शिवसेना के उपराज्य प्रमुख पं. पप्पू तिवारी,पं. रामचरण शास्त्री श्रीहरि, पं. नवीन बिहारी दुबे, पं. दिनेश उपाध्याय, पं. हरिहर मिश्रा, पं. नंदन पाण्डेय, पं. गौरव शास्त्री, पं. महेश प्रसाद तिवारी, पं. त्रिलोक तिवारी, पं. प्रदीप दुबे, पं. शिवनारायण तिवारी, पं. मनोज कुमार तिवारी, शिवनारायण गोस्वामी, पं. रामसेवक पाठक, पं. द्वारका दुबे, पं. रामाधार तिवारी, पं. बृजेश मिश्रा, पं. आशीष प्यासी, पं. शक्ति मिश्रा, पं. हरिनारायण मिश्रा, पं. कामता प्रसाद रिछारिया, पं. देवांश मिश्रा, पं. नरेंद्र रिछारिया, पं. रामकृष्ण शास्त्री, पं. दिनेश पाण्डेय, सुरेंद्र मिश्रा, महेश दुबे, राकेश प्यासी, शिवम मिश्रा सहित बड़ी संख्या में पुरोहित, पुजारी, विद्वतजन एवं विप्र समाज के लोग शामिल रहे।
 

Anil Dubay
By Anil Dubay

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