नई दिल्ली। केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक बार फिर सुनवाई चल रही है। मंदिर का प्रबंधन देखने वाले त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड की ओर से वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने SC में दलील दी कि किसी भी धार्मिक प्रथा को सही या गलत ठहराने का आधार उस समुदाय की आस्था होनी चाहिए न कि अदालत का व्यक्तिगत मूल्यांकन।
सिंघवी ने कहा कि धर्म मूल रूप से किसी समुदाय की सामूहिक आस्था से जुड़ा होता है। ऐसे में कुछ व्यक्तियों जैसे महिलाओं की एंट्री के अधिकार पूरे समुदाय की धार्मिक परंपराओं पर हावी नहीं होने चाहिए। उन्होंने यह भी जोड़ा कि अदालत को यह तय करने से बचना चाहिए कि किसी धर्म के लिए क्या सही है और क्या नहीं।
यह भी पढ़ें: लोकसभा में सीटें बढ़ाने की तैयारी: 2029 तक होंगी 850 सीटें, जानिए पूरी डिटेल
7 से 9 अप्रैल तक चली पिछली सुनवाई में भी महिलाओं के प्रवेश के विरोध में इसी तरह के तर्क दिए गए थे। केंद्र सरकार ने भी कहा था कि देश के कई मंदिरों में पुरुषों की एंट्री पर भी रोक है, इसलिए धार्मिक परंपराओं का सम्मान किया जाना चाहिए।
1991: केरल हाईकोर्ट ने 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर रोक लगा
2018: सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रतिबंध को भेदभावपूर्ण बताते हुए हटा दिया
इसके बाद: फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिकाएं दायर हुईं
अब इन्हीं याचिकाओं के आधार पर 7 अहम संवैधानिक सवालों पर बहस जारी है।
यह भी पढ़ें: राघव चड्ढा की सिक्योरिटी पर बड़ा ट्विस्ट: पंजाब में सुरक्षा हटी, अब Z कैटेगरी की चर्चा तेज
सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने अहम सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि जब संविधान के अनुच्छेद 25(2)(B) के तहत किसी कानून की जांच होगी, तो अदालत को यह तय करना पड़ेगा कि कौन-सी धार्मिक प्रथा जरूरी है।
इस पर सिंघवी ने कहा कि यही एक जटिल मुद्दा है, जिसे बड़ी (9 जजों की) बेंच को स्पष्ट करना चाहिए। उनके मुताबिक जरूरी प्रथा की जांच को इस तरह के मामलों में शामिल नहीं किया जाना चाहिए।
जस्टिस सुंदरेश ने यह भी पूछा कि सार्वजनिक व्यवस्था, स्वास्थ्य और नैतिकता” के साथ सामाजिक कल्याण शब्द क्यों जोड़ा गया है। इस पर सिंघवी ने उदाहरण देते हुए कहा कि कुछ प्रथाएं धार्मिक मानी जाती हैं, लेकिन आधुनिक मानकों पर सही नहीं ठहरतीं जैसे बहुविवाह।
[breaking type="Breaking"]