फाल्गुन की पूर्णिमा आते ही हवा में एक अलग सी खुशबू घुल जाती है। ढोल की थाप, गुजिया की मिठास और रंगों की बौछार- यही है होली की पहचान। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि रंगों से खेलने की परंपरा शुरू कैसे हुई? क्यों लोग एक-दूसरे को गुलाल लगाकर गले मिलते हैं? दरअसल, होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि कई पौराणिक कथाओं और भावनाओं से जुड़ा पर्व है।
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होली की शुरुआत होलिका दहन से होती है। इसके पीछे असुर राजा हिरण्यकश्यप और उसके भक्त पुत्र प्रह्लाद की कहानी जुड़ी है।
हिरण्यकश्यप भगवान विष्णु से घृणा करता था, जबकि उसका बेटा प्रह्लाद विष्णु का सच्चा भक्त था। पिता ने कई बार प्रह्लाद को मारने की कोशिश की, लेकिन हर बार वह बच गया। आखिर में हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका की मदद ली।
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होलिका को वरदान था कि आग उसे जला नहीं सकती। वह प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठ गई। लेकिन भगवान की कृपा से होलिका जल गई और प्रह्लाद सुरक्षित बच गया। इसी घटना की याद में हर साल होलिका दहन किया जाता है।
रंगों वाली होली की सबसे लोकप्रिय कथा भगवान श्रीकृष्ण और राधा से जुड़ी है। कहते हैं कि श्रीकृष्ण का रंग सांवला था और राधा का रंग गोरा। एक दिन कृष्ण ने मां यशोदा से पूछा कि उनका रंग राधा जैसा क्यों नहीं है। तब यशोदा ने मुस्कुराकर कहा, तुम राधा को अपने रंग में रंग दो। बस फिर क्या था, कृष्ण ने राधा और गोपियों के साथ रंगों की होली खेली। माना जाता है कि वहीं से रंग लगाने की परंपरा शुरू हुई।

एक और कथा भगवान शिव और कामदेव से जुड़ी है। माता पार्वती शिव से विवाह करना चाहती थीं, लेकिन शिव तपस्या में लीन थे। तब कामदेव ने शिव की तपस्या भंग करने के लिए उन पर पुष्प बाण चलाए। शिव ने क्रोधित होकर अपनी तीसरी आंख खोली और कामदेव भस्म हो गए। बाद में शिव ने उन्हें फिर से जीवित किया। कहा जाता है कि यह घटना भी फाल्गुन महीने में हुई थी। इसलिए होली को प्रेम और समर्पण का प्रतीक भी माना जाता है।

एक कथा के अनुसार, एक गांव में एक असुर स्त्री लोगों को परेशान करती थी। गुरु वशिष्ठ ने उपाय बताया कि उसकी मिट्टी की मूर्ति बनाकर पूजा करें और उसे जलाएं। गांव वालों ने ऐसा ही किया। जैसे ही मूर्ति जली, असुर स्त्री भी नष्ट हो गई। इसके बाद गांव में खुशियां मनाई गईं। यह कथा भी होलिका दहन और होली के उत्सव से जोड़ी जाती है।
रंग लगाने की परंपरा सिर्फ पौराणिक कथाओं से नहीं, बल्कि सामाजिक भावनाओं से भी जुड़ी है। रंग बराबरी का प्रतीक हैं। जब चेहरों पर रंग लग जाता है, तो कोई छोटा-बड़ा नहीं दिखता। अमीर-गरीब का फर्क मिट जाता है। सब एक जैसे नजर आते हैं। मन के गिले-शिकवे भूल जाओ, रिश्तों में नया रंग भरो। पहले लोग प्राकृतिक रंगों से होली खेलते थे- फूलों और हल्दी से बने रंग। आज केमिकल वाले रंग त्वचा को नुकसान पहुंचाते हैं, इसलिए सुरक्षित और प्राकृतिक रंगों का उपयोग करना बेहतर है।
तो अगली बार जब आप किसी को रंग लगाएं, याद रखिए यह सिर्फ रंग नहीं, बल्कि रिश्तों को मजबूत करने का तरीका है।