Download App
Download on the App StoreGet it on Google Play
Breaking News

क्या आपने देखा कभी?चिताओं की राख में खेला जाने वाला अजीब त्योहार!

काशी की मसाने की होली एक ऐसा त्योहार है जिसे देखने के लिए लोग दूर-दूर से आते हैं। लेकिन यह कोई साधारण होली नहीं है। यहाँ रंगों और गुलाल की जगह चिताओं की राख से होली खेली जाती है। इसे देखकर श्रद्धालु और पर्यटक दोनों हैरान रह जाते हैं।
चिताओं की राख में खेला जाने वाला अजीब त्योहार!
Ai Generated
    यह सारांश आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस द्वारा तैयार किया गया है और हमारी टीम द्वारा रिव्यू की गई है।

    होली रंगों का त्योहार है, लेकिन काशी (वाराणसी) में इसे एक अलग रूप में मनाया जाता है। यहां रंगों और गुलाल के साथ-साथ चिताओं की राख से भी होली खेली जाती है, जिसे मसाने की होली कहते हैं। यह त्योहार न सिर्फ अनोखा है बल्कि आध्यात्मिक महत्व भी रखता है। इस साल मसाने की होली 28 फरवरी 2026 को मनाई जाएगी।

    हरिश्चंद्र घाट पर होली का नजारा

    इस साल, 27 फरवरी 2026 को हरिश्चंद्र घाट पर भी भस्म की होली का आयोजन होगा। मणिकर्णिका घाट की तरह, यहां भी शिव बारात निकलती है। बारात अघोरपीठ के बाबा कीनाराम से शुरू होकर हरिश्चंद्र घाट तक जाती है।

    बारात में भगवान शिव के अलग-अलग स्वरूप नजर आते हैं और पूरे दौरान भस्म और गुलाल उड़ते हैं। यह दृश्य देखने के लिए देश-विदेश से लोग हर साल आते हैं। हरिश्चंद्र घाट पर भस्म की होली का नजारा बेहद आध्यात्मिक और रहस्यमयी होता है।

    भगवान भोलेनाथ और रंगों की होली

    वाराणसी में रंगभरी एकादशी के दिन भगवान शिव और माता पार्वती रंगों से होली खेलते हैं। इस अवसर पर श्रद्धालु गुलाल और फूलों के रंगों के साथ उत्सव मनाते हैं। लेकिन इसके अगले दिन यानी फाल्गुन शुक्ल द्वादशी पर भगवान महाश्मशानाथ, अपने गणों भूत-प्रेत, पिशाच, यक्ष, गंधर्व, राक्षस आदि के साथ भस्म की होली खेलते हैं। 

    शिवपुराण और दुर्गा सप्तशती में भी इस अनोखे उत्सव का उल्लेख मिलता है। इसे देखकर यह स्पष्ट होता है कि मसान की होली जीवन और मृत्यु के चक्र, मोह-माया और आत्मा की अमरता का प्रतीक है।

    राख का त्योहार- मसान होली

    मसान होली वाराणसी का एक अनोखा और आध्यात्मिक त्योहार है। यहां होली में न रंगों की बौछार होती है, न पिचकारी या गुलाल की बौछार। इस दिन भोलेनाथ के भक्त भूत-पिशाच की भेष में, श्मशान की राख यानि भस्म से होली खेलते हैं।

    'मसान' का अर्थ श्मशान होता है, यानी वह स्थान जहां शव दाह किए जाते हैं। इस होली का महत्व यह है कि यह मोह-माया के जाल से मुक्ति और मृत्यु पर विजय का प्रतीक है। यह दिखाता है कि जीवन में सब कुछ क्षणिक है और सब राख में बदल जाता है।

    कौन खेल सकता है मसान होली?

    मसान होली को भस्म होली या भभूत होली के नाम से भी जाना जाता है। यह विश्व प्रसिद्ध त्योहार है और देखने के लिए देश-विदेश से लोग काशी आते हैं। इस होली में भाग लेने वाले आमतौर पर साधु-संत, अघोरी और पुरुष श्रद्धालु होते हैं। 

    मसान होली की शुरुआत

    पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस होली की शुरुआत भगवान शिव ने की थी। कहा जाता है कि रंगभरी एकादशी के दिन, बाबा विश्वनाथ माता पार्वती के साथ विवाह के बाद पहली बार काशी आए थे। उनका स्वागत गुलाल के रंगों से किया गया।
    पहली बार रंगभरी होली में भगवान शिव ने अपने गणों के साथ खेला, लेकिन भूत-प्रेत, यक्ष और गंधर्व के साथ नहीं। इसलिए अगले दिन श्मशान की राख से होली खेलने की परंपरा शुरू हुई, जिसे आज मसाने की होली के नाम से जाना जाता है।

    काशी- मोक्ष का धाम

    वाराणसी को मोक्ष का धाम माना जाता है। यहां की मान्यता है कि जो व्यक्ति मृत्यु को प्राप्त करता है, उसकी आत्मा सीधे भगवान शिव के चरणों में प्रस्थान करती है और वह जन्म-मृत्यु के बंधनों से मुक्त हो जाता है। इस कारण काशी को मुक्तिधाम भी कहा जाता है।

    Garima Vishwakarma
    By Garima Vishwakarma

    गरिमा विश्वकर्मा | People’s Institute of Media Studies से B.Sc. Electronic Media की डिग्री | पत्रकार...

    Latest Posts