
Holi 2025: होली का त्योहार हर साल फाल्गुन मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। यह केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि प्रेम, भक्ति और आध्यात्मिकता का प्रतीक भी है। इस दिन पूरा देश रंगों में सराबोर हो जाता है और लोग आपसी मतभेद भुलाकर एक-दूसरे पर प्यार के रंग बरसाते हैं। होली को बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में भी देखा जाता है, क्योंकि इसके पीछे कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। आइए जानते हैं कि आखिर हम फाल्गुन में ही होली क्यों मनाते हैं और इसके पीछे कौन-कौन सी धार्मिक मान्यताएं हैं।
होली का महत्व
होली का पर्व केवल रंगों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारी संस्कृति, परंपरा और धार्मिक मान्यताओं से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। यह त्योहार लोगों को आपसी प्रेम और भाईचारे का संदेश देता है। खासतौर पर उत्तर भारत में इसे बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है। वृंदावन, मथुरा, बरसाना और नंदगांव में तो यह त्योहार कई दिनों तक चलता है। जहां कृष्ण और राधा की प्रेम लीला के रूप में इसे मनाने की परंपरा है।
होली सिर्फ एक सामाजिक और सांस्कृतिक त्योहार नहीं है, बल्कि आध्यात्मिक दृष्टि से भी इसका विशेष महत्व है। इस दिन भगवान विष्णु और शिव की पूजा का विधान भी किया जाता है।
होली मनाने की पौराणिक कथाएं
होली के पर्व से जुड़ी कई प्रचलित पौराणिक कथाएं हैं, जो इसे मनाने के धार्मिक कारणों को दर्शाती हैं। इनमें से प्रमुख कथाएं कुछ इस तरह हैं:
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भक्त प्रह्लाद और होलिका की कथा
यह कथा सबसे अधिक प्रसिद्ध है और इसे होली के उत्सव का आधार भी माना जाता है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, हिरण्यकश्यप नाम का एक राक्षस था, जो स्वयं को भगवान मानता था। उसने अपने राज्य में भगवान विष्णु की पूजा करने पर रोक लगा दी थी, लेकिन उसका पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त था। हिरण्यकश्यप ने कई बार अपने पुत्र को मारने की कोशिश की, लेकिन हर बार वह बच जाता।
अंत में उसने अपनी बहन होलिका को प्रह्लाद को मारने का आदेश दिया। होलिका को वरदान प्राप्त था कि वह आग में नहीं जल सकती थी। वह प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठ गई, लेकिन भगवान विष्णु की कृपा से होलिका खुद जलकर राख हो गई और प्रह्लाद सुरक्षित बच गया। इसी घटना की याद में होलिका दहन किया जाता है, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है।
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भगवान शिव और कामदेव की कथा
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, माता पार्वती भगवान शिव से विवाह करना चाहती थीं। इसके लिए उन्होंने कठोर तपस्या की, लेकिन भगवान शिव तपस्या में लीन थे। देवताओं को यह चिंता थी कि शिव और पार्वती का विवाह जरूरी है, क्योंकि उनके पुत्र के हाथों ही राक्षस ताड़कासुर का वध होना तय था।
इसलिए, देवताओं ने कामदेव को शिवजी की तपस्या भंग करने भेजा। कामदेव ने पुष्प वाण छोड़कर भगवान शिव की समाधि भंग कर दी। इससे क्रोधित होकर भगवान शिव ने अपना तीसरा नेत्र खोलकर कामदेव को भस्म कर दिया। बाद में, माता पार्वती की आराधना से भगवान शिव प्रसन्न हुए और उनसे विवाह किया। कामदेव की पत्नी रति ने भी अपने पति को पुनर्जीवित करने की प्रार्थना की, जिसे भगवान शिव ने स्वीकार किया। इस घटना की खुशी में देवताओं ने रंगों से खेला और तब से फाल्गुन पूर्णिमा को होली मनाने की परंपरा शुरू हुई।
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राधा-कृष्ण और रंगों की होली
भगवान श्रीकृष्ण और राधा की प्रेम गाथा से जुड़ी यह कथा भी होली मनाने के प्रमुख कारणों में से एक मानी जाती है।
कहते हैं कि भगवान कृष्ण का रंग सांवला था और राधा का रंग गोरा था। कृष्ण ने अपनी मां यशोदा से पूछा कि राधा इतनी गोरी क्यों हैं? इस पर यशोदा जी ने हंसते हुए कहा कि तुम भी राधा को अपने जैसा रंग लगा दो। इसके बाद कृष्ण अपनी मित्र मंडली के साथ राधा और उनकी सखियों के पास गए और उन पर रंग डाल दिया। तब से ही ब्रज में रंगों की होली खेलने की परंपरा शुरू हो गई, जो आज भी मथुरा-वृंदावन में विशेष रूप से मनाई जाती है।
कैसे मनाई जाती है होली?
होली दो दिनों तक मनाई जाती है।
पहला दिन – होलिका दहन:
फाल्गुन पूर्णिमा की रात होलिका दहन किया जाता है। इस दिन लोग लकड़ियां और उपले जलाकर होलिका दहन करते हैं और उसमें बुरी आदतों और नकारात्मकता को जलाने की प्रतीकात्मक परंपरा निभाते हैं।
दूसरा दिन – रंगों की होली:
अगले दिन लोग एक-दूसरे को रंग, गुलाल और अबीर लगाते हैं। यह दिन आपसी प्रेम, सौहार्द और भाईचारे को बढ़ावा देने का अवसर होता है। इस दिन विशेष पकवान बनाए जाते हैं। जिनमें गुझिया, मालपुआ, ठंडाई और पापड़ प्रमुख होते हैं।