वरुण कुमार चौहान, रायपुर। नवा रायपुर के पुरखौती मुक्तांगन में शुक्रवार को रायपुर साहित्य उत्सव का भव्य शुभारंभ हुआ। इस दौरान देशभर से सुप्रसिद्ध उपन्यासकार, लेखक, कवि और विभिन्न शैलियों में लिखने वाले साहित्यकार यहां जुटे। इन्हीं गणमान्य हस्तियों के बीच नारी चेतना, महिला सशक्तीकरण, स्त्री संघर्ष और दलित-आदिवासियों के मन की पीड़ा को वैश्विक मंच प्रदान करने वाली सुप्रसिद्ध लेखिका डॉ. इंदिरा दांगी की गरिमामय उपस्थिति भी रही। साहित्यकारों के इस महाकुंभ में हमारे साथ इंदिरा दांगी ने अपने साहित्य लेखन और जीवन से जुड़े अनुभव साझा किए। उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश : --
प्रश्न : आपकी रचनाओं में स्त्री अनुभव और सामाजिक यथार्थ बार-बार दिखाई देता है। इसके पीछे आपकी सोच क्या है?
उत्तर : जहां भी पीड़ा ज्यादा है, संघर्ष ज्यादा है, अत्याचार है वहां पर कहानी ज्यादा है। दलित और आदिवासियों की लेखिका भी मैं हूं। जो दबा कुचला है उसी की तो कहानी होगी ना। आप यह तो नहीं कह सकते कि नायक नोट गिनते-गिनते थक गया। वह नायक जिसका खून निकलता है, जो लड़ता है, रोता है, अत्याचार से लड़ता है। स्त्री स्वाभाविक तौर पर और आदिवासी व दलित समाज के दबे कुचले लोग... स्वाभाविक सी बात है कि वे साहित्य में आएंगे ही।
प्रश्न : साहित्य और समाज के रिश्ते को आप कैसे देखती हैं। क्या साहित्य सच में बदलाव ला सकता है?
उत्तर : जो समाज है वही साहित्य है। हम कहां से आए। आप ही लोगों के बीच में आए। जिस समय के लोग जैसे होते हैं। उस समय का समाज वैसा होता है। अगर स्त्री के समर्थन में लिख रहे हैं तो लोग लव जिहाद पर भी लिख रहे हैं और हनी ट्रैप पर भी लिख रहे हैं और स्त्री विमर्श का कार्ड खेलने वाली स्त्रियों पर भी लिख रहे हैं। जो समाज में चल रहा है, वही रचनाकार या चित्रकार या कलाकार अपनी कला में परिवर्तित करके समाज को लौटाता है।
प्रश्न : एक लेखिका के रूप में आपको किन संघर्षों से गुजरना पड़ा?
उत्तर : बहुत सारे संघर्षों से गुजरना पड़ा, लेखिका होने के कारण तो जीवन बहुत ज्यादा कठिन हो जाता है। सबसे पहले तो इस नजर से देखते हैं कि वह एक कहावत है अग्रेजी की ‘बाय युअरलुक, सेल युअर बुक’। मतलब आपकी योग्यता को खारिज ही कर देंगे। बोलेंगे कि आप दिखते ऐसे हो इस वजह से आपको तवज्जो मिलती है, सारी ही लेखिकाओं को ये दिक्कत होती है ये आरोप उनपर लगता है। इसलिए मुझे लगता है कि लेखक हैं और बदकिस्मती से स्त्री हैं तो बहुत रास्ता बहुत कठिन होता है। लेकिन ये शुरूआती चीज है। अगर हमारे पास सचमुच में कुछ है लिखा हुआ.. अगर किताब है तो वो बचेगी।
प्रश्न : कहां के शुरूआत हुई.... साहित्य जगत में प्रवेश कैसे हुआ ?
उत्तर : मेरे पापा पुलिस अधिकारी थे और बहुत सारी किताबें बढ़ते रहते थे। यायावर थे। दो चीजें मेरे अंदर उनसे आई.... जैसे संस्कृत साहित्य में कहा जाता है कि लेखक तीन चीजों से बनता है। प्रतिभा, अध्ययन और अभ्यास। तो जीवन को जानना सबसे बड़ी किताब है। तो जीवन को जाना...हजारों किताबें पढ़ीं। कम उम्र में शादी हो गई। बहुत साल रसोई में ही सूरज उगाता था और वहीं डूब जाता था। लेकिन इस दौरान हजारों किताबें पढ़ी मैंने। मैं किसी से भी कहूंगी कि आप हजारों किताबें पढ़ जाइये आप कुछ न कुछ बन जाएंगे। मेरे उपन्यास ‘हवेली सनातनपुर’ में एक लाइन है कि दुनिया अगर बदलेगी तो किताबों से बदलेगी। जैसी कि मेरी बदली।
प्रश्न : आपके आगामी उपान्यास और कृतियां क्या हैं
उत्तर : मेरा एक उपन्यास तो अभी आधार प्रकाशन से आएगा। एक कहानी संग्रह और समग्र नाटकों का संग्रह भारतीय ज्ञानपीठ से आएंगे। एक उपन्यास मैं लिख रही हूं। वो एक लड़की अनीता सेहरिया के संघर्ष की कहानी है।
प्रश्न : जो युवा आज लिखना चाहते हैं, खासकर लड़कियां, उन्हें आप क्या सलाह देना चाहेंगी?
उत्तर : मैं कहूंगी कि पहले पढ़िये। आप किसी पेड़ के जगमगाते नए पत्ते हैं पहले उस पेड़ को तो जानिए। उसमें शाखाएं हैं फल हैं। लोग पढ़ते नहीं हैं, दूसरी तीसरी कहानी लिखकर कहते हैं मैं लेखक हूं....अच्छा आप कौन हैं? तो आपने पढ़ा ही नहीं कि वो आदमी 40 साल से लिख रहा है और उसका नाम सिलेबसों व किताबों में है तो मैं कहूंगी....थोड़ा धैर्य रखिए। कला कोई रील वायरल होना नहीं है, कला तो ‘जो सर काटे आपना चले हमारे साथ’ अपना जीवन देना हो तो आइये। देने के लिए आइये लेने के लिए नहीं तब तो आप हममे से एक होंगे। तैयारी से आइये। ये मत सोचिए कि आप जो भाषा वाट्सएप पर लिख रहे हैं उसमें कोई कहानी लिख लेंगे।
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