राष्ट्रपति ने उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ का इस्तीफा स्वीकार किया, पीएम मोदी ने दी शुभकामनाएं, विपक्ष ने उठाए सवाल

नई दिल्ली। देश के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने सोमवार देर रात एक अप्रत्याशित निर्णय लेते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया। संसद के मानसून सत्र के ठीक पहले उनके इस कदम ने सियासी गलियारों में हलचल मचा दी है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को भेजे अपने इस्तीफे में उन्होंने स्वास्थ्य कारणों और चिकित्सकीय परामर्श का हवाला दिया। उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ का इस्तीफा मंगलवार को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने मंजूर कर लिया। राज्यसभा में पीठासीन घनश्याम तिवाड़ी ने यह जानकारी दी। इसके बाद, धनखड़ आज सदन की कार्यवाही में भी शामिल नहीं हुए।
देश की सेवा में निभाई कई भूमिकाएं- पीएम मोदी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने धनखड़ के इस्तीफे पर प्रतिक्रिया देते हुए एक्स पर लिखा, “श्री जगदीप धनखड़ जी को भारत के उपराष्ट्रपति सहित कई भूमिकाओं में देश की सेवा करने का अवसर मिला है। मैं उनके उत्तम स्वास्थ्य की कामना करता हूं।”
उपसभापति संभालेंगे कार्यवाही
उपराष्ट्रपति के पद से त्यागपत्र के साथ ही राज्यसभा के सभापति का पद भी स्वतः रिक्त हो गया है, क्योंकि भारत का उपराष्ट्रपति राज्यसभा का पदेन सभापति होता है। अब जब तक नया उपराष्ट्रपति नहीं चुना जाता, उपसभापति हरिवंश राज्यसभा की कार्यवाही का संचालन करेंगे। जरूरत पड़ने पर राष्ट्रपति द्वारा अधिकृत किसी वरिष्ठ सदस्य को भी यह जिम्मेदारी दी जा सकती है।
छह माह में होगा नया चुनाव
संविधान के अनुसार, उपराष्ट्रपति पद की रिक्ति होने की स्थिति में छह महीने के भीतर चुनाव कराना अनिवार्य है। ऐसे में देश को आगामी महीनों में नए उपराष्ट्रपति के चुनाव की प्रक्रिया देखने को मिलेगी।
इस्तीफा पहले भी दिया जा सकता था- विपक्ष
धनखड़ के अचानक इस्तीफे पर विपक्ष ने सवाल खड़े किए हैं। कांग्रेस सांसद सुखदेव भगत ने कहा, “हम उपराष्ट्रपति के अच्छे स्वास्थ्य की कामना करते हैं, लेकिन उनका इस्तीफा सत्र शुरू होने से पहले भी दिया जा सकता था। यह फैसला चौंकाने वाला और अप्रत्याशित था।”
विपक्ष पहले से ही धनखड़ पर पक्षपातपूर्ण रवैये का आरोप लगाता रहा है। अब उनके इस्तीफे के समय को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। माना जा रहा है कि संसद के मानसून सत्र में इस मुद्दे को लेकर विपक्ष सरकार को घेरने की कोशिश करेगा।
धनखड़ के कार्यकाल में कई बार विपक्ष ने उनके सत्र संचालन के तरीके, विशेषकर विपक्षी सांसदों के निलंबन और बहस के दौरान व्यवहार को लेकर आलोचना की थी। यहां तक कि उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की भी चर्चा हुई थी, जो उनके कार्यकाल में दुर्लभ घटना थी।












