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रूस का चौंकाने वाला दावा!क्या दुनिया को तीसरे विश्व युद्ध से बचा सकते हैं परमाणु हथियार?

रूस ने परमाणु हथियारों को लेकर बड़ा बयान देते हुए कहा है कि न्यूक्लियर डिटरेंस ही दुनिया को तीसरे विश्व युद्ध जैसे बड़े खतरे से बचा रहा है। क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था के कमजोर होने पर चिंता जताई और कहा कि फिलहाल परमाणु हथियारों के अलावा कोई प्रभावी सुरक्षा विकल्प नहीं है।
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क्या दुनिया को तीसरे विश्व युद्ध से बचा सकते हैं परमाणु हथियार?

दुनिया भर में बढ़ते तनाव, युद्ध और परमाणु हथियारों की होड़ के बीच रूस ने एक बार फिर ऐसा बयान दिया है, जिसने वैश्विक राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। रूस का कहना है कि परमाणु हथियार केवल विनाश का साधन नहीं हैं, बल्कि यही हथियार दुनिया को तीसरे विश्व युद्ध जैसे बड़े खतरे से बचाने का काम भी कर रहे हैं।

रूस के राष्ट्रपति भवन क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने कहा है कि मौजूदा समय में परमाणु हथियार ही दुनिया में संतुलन बनाए हुए हैं। उनके मुताबिक, यदि परमाणु हथियार नहीं होते तो कई बड़े देश सीधे युद्ध की राह पर निकल सकते थे, जिससे पूरी दुनिया एक बड़े संघर्ष में फंस सकती थी।

दिमित्री पेस्कोव ने क्या कहा?

बुधवार (24 जून 2026) को मीडिया से बातचीत करते हुए दिमित्री पेस्कोव ने कहा कि दुनिया की सुरक्षा व्यवस्था लगातार कमजोर होती जा रही है। ऐसे में परमाणु हथियारों के जरिए बनाया गया डर और संतुलन ही देशों को बड़े युद्ध से दूर रख रहा है। उन्होंने कहा कि आज की वास्तविकता यह है कि न्यूक्लियर डिटरेंस यानी परमाणु प्रतिरोधक क्षमता के अलावा दुनिया के पास कोई ऐसा मजबूत सुरक्षा तंत्र नहीं है, जो बड़े युद्धों को रोक सके।

पेस्कोव का मानना है कि जब किसी देश को यह पता होता है कि युद्ध की स्थिति में सामने वाला देश भी परमाणु हमला कर सकता है, तो वह हमला करने से पहले कई बार सोचता है। यही डर बड़े युद्धों को रोकने में मदद करता है।

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भविष्य में परमाणु हथियार बन सकते हैं नए हथियार

रूसी प्रवक्ता ने केवल परमाणु हथियारों की बात नहीं की, बल्कि भविष्य की सैन्य तकनीकों को लेकर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि आने वाले वर्षों में ऐसी नई तकनीकें विकसित हो सकती हैं, जिनसे बनाए गए गैर-परमाणु हथियार भी उतने ही खतरनाक और विनाशकारी साबित हो सकते हैं जितने आज परमाणु हथियार हैं। हालांकि उन्होंने किसी देश का नाम नहीं लिया, लेकिन उनका इशारा आधुनिक सैन्य तकनीकों, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित हथियारों और हाई-टेक मिसाइल सिस्टम की ओर माना जा रहा है।

चीन और ईरान को लेकर पहले भी जताई चिंता

हाल के महीनों में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कई बार चीन के बढ़ते परमाणु हथियार कार्यक्रम और ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं को लेकर चिंता जाहिर कर चुके हैं। अमेरिका का मानना है कि यदि दुनिया में परमाणु हथियारों का प्रसार लगातार बढ़ता रहा, तो वैश्विक सुरक्षा के सामने गंभीर खतरे पैदा हो सकते हैं। इसी वजह से अमेरिका लंबे समय से नई परमाणु नियंत्रण संधि की वकालत करता रहा है, जिसमें चीन को भी शामिल करने की बात कही गई है।

परमाणु हथियारों का जिक्र कर चुके हैं पुतिन

रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध के दौरान राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन कई बार परमाणु हथियारों का जिक्र कर चुके हैं। युद्ध को चार साल से अधिक समय हो चुका है और इस दौरान रूस की ओर से कई बार ऐसे बयान सामने आए हैं, जिनमें परमाणु ताकत का उल्लेख किया गया।
पश्चिमी देशों का आरोप है कि रूस परमाणु हथियारों का जिक्र करके राजनीतिक और सैन्य दबाव बनाने की कोशिश करता है। वहीं रूस का कहना है कि वह केवल अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक संतुलन की बात करता है।

नई परमाणु संधि को लेकर रूस की क्या है राय?

डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में एक नई परमाणु नियंत्रण संधि का प्रस्ताव रखा था, जिसमें अमेरिका, रूस और चीन को शामिल करने की बात कही गई। लेकिन रूस का कहना है कि यदि चीन को किसी नई संधि में शामिल किया जाता है, तो अमेरिका के सहयोगी देशों को भी इसमें जगह मिलनी चाहिए।

रूस के अनुसार ब्रिटेन और फ्रांस जैसे देशों के पास भी परमाणु हथियार हैं। इसलिए केवल रूस, अमेरिका और चीन के बीच समझौता करना पूरी तस्वीर नहीं दिखाता।

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क्या थी न्यू स्टार्ट संधि?

परमाणु हथियारों पर नियंत्रण को लेकर दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण संधियों में से एक थी न्यू स्टार्ट (New START) संधि। इस समझौते पर रूस और अमेरिका ने वर्ष 2010 में हस्ताक्षर किए थे। इसका उद्देश्य दोनों देशों के परमाणु हथियारों की संख्या को सीमित रखना था। संधि के तहत दोनों देशों को अधिकतम 1,550 तैनात परमाणु वॉरहेड रखने की अनुमति थी। इसके अलावा मिसाइलों और लॉन्चिंग सिस्टम पर भी कई तरह की सीमाएं तय की गई थीं। यह समझौता शीत युद्ध (Cold War) के बाद परमाणु हथियारों पर नियंत्रण की दिशा में सबसे बड़ा कदम माना जाता था।

संधि खत्म होने के बाद क्यों बढ़ी चिंता?

फरवरी 2026 में न्यू स्टार्ट संधि की अवधि समाप्त हो गई। इसके साथ ही रूस और अमेरिका पर लगी कई महत्वपूर्ण सीमाएं भी खत्म हो गईं। अब दशकों में पहली बार ऐसी स्थिति बन गई है, जब दुनिया की दो सबसे बड़ी परमाणु शक्तियों के बीच परमाणु हथियारों की तैनाती को नियंत्रित करने वाली कोई सक्रिय संधि मौजूद नहीं है।

Garima Vishwakarma
By Garima Vishwakarma

गरिमा विश्वकर्मा | People’s Institute of Media Studies से B.Sc. Electronic Media की डिग्री | पत्रकार...Read More

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