मिडिल ईस्ट में जारी ईरान-अमेरिका-इजरायल संघर्ष अब वैश्विक चिंता का विषय बन चुका है। युद्ध के बढ़ते खतरे और तेल संकट के बीच दुनिया की नजर अब भारत पर टिक गई है। कई अंतरराष्ट्रीय नेता और रणनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि, भारत इस संकट में शांति स्थापित कराने में अहम भूमिका निभा सकता है।
इसी बीच फिनलैंड के राष्ट्रपति अलेक्जेंडर स्टब ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से इस संघर्ष को रोकने के लिए मध्यस्थता करने की अपील की है। उनका मानना है कि, भारत की संतुलित कूटनीति और सभी पक्षों के साथ अच्छे संबंध इस युद्ध को खत्म कराने में मदद कर सकते हैं।
फिनलैंड के राष्ट्रपति अलेक्जेंडर स्टब हाल ही में नई दिल्ली में आयोजित रायसीना डायलॉग 2026 में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए थे। इस दौरान उन्होंने भारत की कूटनीतिक भूमिका की सराहना करते हुए कहा कि, मौजूदा हालात में युद्धविराम बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा कि, भारत एक ऐसा देश है जिस पर संघर्ष में शामिल सभी पक्ष भरोसा कर सकते हैं। स्टब के मुताबिक भारत की विदेश नीति संतुलित और शांतिपूर्ण समाधान पर आधारित रही है।
उन्होंने कहा कि, भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी हाल के दिनों में युद्धविराम और बातचीत की अपील की है, जिससे साफ होता है कि भारत इस संकट को कूटनीतिक तरीके से हल करने के पक्ष में है। स्टब ने सवाल उठाते हुए कहा कि, क्या भारत इस संघर्ष को खत्म कराने के लिए आगे आ सकता है? उनका मानना है कि भारत की पहल से ईरान और अमेरिका के बीच सीजफायर संभव हो सकता है।
फिनलैंड ही नहीं, बल्कि अमेरिका और खाड़ी देशों के कई विशेषज्ञ भी इस युद्ध को रोकने के लिए भारत की भूमिका की बात कर रहे हैं। अमेरिकी सेना के रिटायर्ड कर्नल और रणनीतिक विश्लेषक डगलस मैकग्रेगर ने भी कहा कि, अमेरिका को इस संकट से निकलने के लिए भारत की मदद लेनी चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि, अगर युद्ध जारी रहा तो तेल की कीमतें 300 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान होगा।
मैकग्रेगर ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को सलाह दी कि, अगर युद्ध रोकना है तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बात करनी चाहिए। उनके अनुसार भारत की सबसे बड़ी ताकत यह है कि, उसके ईरान, इजरायल और चीन के साथ संतुलित संबंध हैं।
संयुक्त अरब अमीरात के भारत में पूर्व राजदूत हुसैन हसन मिर्जा ने भी कहा कि, इस संकट को समाप्त कराने के लिए प्रधानमंत्री मोदी सबसे उपयुक्त नेता हो सकते हैं। उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा कि, अगर प्रधानमंत्री मोदी इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और ईरानी नेतृत्व से बातचीत करें तो युद्ध को रोकने का रास्ता निकल सकता है। मिर्जा के अनुसार, भारत की कूटनीति और पीएम मोदी की व्यक्तिगत साख इस संकट को हल करने में अहम भूमिका निभा सकती है।
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मिडिल ईस्ट में शुरू हुआ यह युद्ध अब वैश्विक संकट का रूप लेता जा रहा है। इस संघर्ष को दो सप्ताह से अधिक समय हो चुका है और इसका असर दुनिया भर में दिखाई दे रहा है। सबसे बड़ा खतरा वैश्विक ऊर्जा बाजार पर मंडरा रहा है। कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तेजी देखी जा रही है।
ईरान ने चेतावनी दी है कि, अगर युद्ध जारी रहा तो तेल की कीमतें 200 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसा हुआ तो वैश्विक अर्थव्यवस्था गंभीर संकट में पड़ सकती है। यही वजह है कि, कई देशों और अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों की नजर अब भारत की कूटनीतिक भूमिका पर टिक गई है।
ईरान युद्ध को लेकर चीन ने भी मध्यस्थता की पेशकश की है। लेकिन कई विश्लेषकों का मानना है कि चीन निष्पक्ष मध्यस्थ नहीं बन सकता। क्योंकि चीन लंबे समय से ईरान के साथ खड़ा रहा है। ऐसे में उसे एक निष्पक्ष मध्यस्थ के रूप में देखना मुश्किल है। दूसरी ओर भारत ने हमेशा संतुलित और गुटनिरपेक्ष नीति अपनाई है। आजादी के बाद से भारत ने किसी युद्ध में खुलकर किसी एक पक्ष का समर्थन नहीं किया। यही कारण है कि कई देशों को लगता है कि भारत इस संकट को शांत कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
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भारत की सबसे बड़ी ताकत यह है कि उसके इजरायल और ईरान दोनों के साथ अच्छे संबंध हैं। एक तरफ भारत और इजरायल के बीच रक्षा और तकनीकी सहयोग मजबूत है। वहीं दूसरी तरफ भारत और ईरान के बीच ऊर्जा और व्यापारिक संबंध भी लंबे समय से मजबूत रहे हैं।
भारत ईरान के तेल का बड़ा खरीदार रहा है और दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संबंध भी काफी अच्छे रहे हैं। यही वजह है कि, कई विशेषज्ञों का मानना है कि भारत दोनों पक्षों के बीच भरोसे का पुल बन सकता है।
हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरान के राष्ट्रपति डॉ. मसूद पेजेशकियन से फोन पर बातचीत की थी। इस दौरान दोनों नेताओं ने क्षेत्रीय स्थिति और बढ़ते तनाव पर चर्चा की। पीएम मोदी ने इस बातचीत में क्षेत्र में बढ़ती हिंसा और नागरिकों की मौत पर गहरी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि, सभी विवादों का समाधान बातचीत और कूटनीति के जरिए होना चाहिए।
इसके अलावा युद्ध शुरू होने के दो दिन बाद पीएम मोदी ने इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से भी बातचीत की थी। इस बातचीत में उन्होंने क्षेत्रीय स्थिति पर चर्चा करते हुए कहा कि भारत शांति, सुरक्षा और स्थिरता के पक्ष में है और संघर्ष जल्द समाप्त होना चाहिए।
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इस युद्ध के बीच सबसे ज्यादा चिंता स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर है। यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक है। दुनिया की कुल तेल आपूर्ति का लगभग पांचवां हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। अगर यह मार्ग बाधित होता है तो वैश्विक ऊर्जा संकट गहरा सकता है। अमेरिका ने अपने सहयोगी देशों से इस मार्ग की सुरक्षा सुनिश्चित करने में मदद की अपील की है।
अमेरिका के ऊर्जा सचिव क्रिस राइट ने भी संकेत दिया कि भारत इस जलमार्ग की सुरक्षा में अहम भूमिका निभा सकता है। उन्होंने कहा कि, एशियाई देशों की ऊर्जा आपूर्ति का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से आता है, इसलिए इस मार्ग को सुरक्षित रखना बेहद जरूरी है।
इस संकट के बीच भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर भी लगातार कूटनीतिक प्रयास कर रहे हैं। पिछले कुछ दिनों में उन्होंने ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची से कई बार बातचीत की है। इन चर्चाओं में क्षेत्रीय सुरक्षा स्थिति और तनाव कम करने के उपायों पर चर्चा की गई। इन बातचीतों के बाद ही होर्मुज स्ट्रेट से भारत के झंडे वाले कुछ जहाजों को गुजरने की अनुमति मिली थी।
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हालांकि, भारत सहित कई देशों की कोशिशों के बावजूद अभी तक युद्ध समाप्त होने के संकेत नहीं मिले हैं। ईरान ने साफ कहा है कि, वह केवल अस्थायी युद्धविराम नहीं चाहता, बल्कि युद्ध का पूरी तरह अंत चाहता है। तेहरान का कहना है कि, अमेरिका और इजरायल की आक्रामकता के खिलाफ उसे आत्मरक्षा का अधिकार है। ईरान ने चेतावनी दी है कि, अगर युद्ध जारी रहा तो इसके क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
मिडिल ईस्ट संकट के बीच अंतरराष्ट्रीय मंचों पर लगातार यह चर्चा हो रही है कि क्या भारत इस संघर्ष में मध्यस्थ की भूमिका निभाएगा। भारत ने अभी तक आधिकारिक तौर पर इस तरह की भूमिका लेने की घोषणा नहीं की है, लेकिन उसकी कूटनीतिक सक्रियता जरूर बढ़ी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री एस. जयशंकर लगातार कई देशों के नेताओं से बातचीत कर रहे हैं।