पंगुनी उथिरम दक्षिण भारत का एक महत्वपूर्ण हिंदू पर्व है, जिसे विशेष रूप से तमिलनाडु में बड़ी श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। यह पर्व तमिल माह ‘पंगुनी’ में ‘उथिरम’ (उत्तराफाल्गुनी) नक्षत्र के दिन आता है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन कई दिव्य विवाह हुए थे, इसलिए इसे दिव्य विवाहों का दिन भी कहा जाता है। इस अवसर पर भक्त व्रत रखते हैं, मंदिरों में पूजा-अर्चना करते हैं और भगवान से सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। यह पर्व प्रेम, भक्ति और वैवाहिक जीवन की पवित्रता का प्रतीक माना जाता है।
साल 2026 में पंगुनी उथिरम 01 अप्रैल, बुधवार को मनाया जाएगा।
उथिरम नक्षत्र प्रारंभ: 31 मार्च 2026, दोपहर 3:20 बजे
उथिरम नक्षत्र समाप्त: 01 अप्रैल 2026, शाम 4:17 बजे
ब्रह्म मुहूर्त - 04:39 ए एम से 05:25 ए एम
प्रातः सन्ध्या - 05:02 ए एम से 06:11 ए एम
अभिजित मुहूर्त - कोई नहीं
विजय मुहूर्त - 02:30 पी एम से 03:20 पी एम
गोधूलि मुहूर्त - 06:38 पी एम से 07:01 पी एम
सायाह्न सन्ध्या - 06:39 पी एम से 07:48 पी एम
अमृत काल - 08:48 ए एम से 10:28 ए एम
निशिता मुहूर्त - 12:02 ए एम, अप्रैल 02 से 12:48 ए एम, 02 अप्रैल
सर्वार्थ सिद्धि योग - 04:17 पी एम से 06:10 ए एम, 02 अप्रैल
रवि योग - 06:11 ए एम से 04:17 पी एम
इस दिन भक्त विशेष पूजा और व्रत करके भगवान से परिवार की खुशहाली और वैवाहिक सुख की कामना करते हैं।
धार्मिक ग्रंथों और मान्यताओं के अनुसार यह दिन कई दिव्य घटनाओं से जुड़ा हुआ है। माना जाता है कि इसी दिन भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था। इसके अलावा भगवान मुरुगन और देवी देवसेना का विवाह भी इसी दिन हुआ था।
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कुछ मान्यताओं के अनुसार इसी दिन भगवान राम और माता सीता का विवाह भी हुआ था। साथ ही समुद्र मंथन के दौरान देवी महालक्ष्मी के प्राकट्य की मान्यता भी इस दिन से जुड़ी है। इसी कारण यह पर्व दांपत्य सुख, प्रेम और पारिवारिक समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।
तमिलनाडु और दक्षिण भारत के कई हिस्सों में यह पर्व बड़े उत्साह और भक्ति के साथ मनाया जाता है। कई मंदिरों में यह उत्सव लगभग 10 दिनों तक चलता है। मंदिरों को सुंदर फूलों और रोशनी से सजाया जाता है। अंतिम दिन ‘थिरुकल्याणम’ (दिव्य विवाह समारोह) आयोजित किया जाता है, जिसमें भगवान और देवी के विवाह का प्रतीकात्मक आयोजन होता है। इस दौरान भजन-कीर्तन, विशेष पूजा और रथ यात्राएं निकाली जाती हैं, जिनमें बड़ी संख्या में भक्त शामिल होते हैं।
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पंगुनी उथिरम के अवसर पर भगवान मुरुगन के भक्त कावड़ी यात्रा भी करते हैं। भक्त कंधों पर सजी हुई कावड़ी लेकर मंदिर तक पैदल यात्रा करते हैं और भगवान को दूध या जल अर्पित करते हैं। कई लोग कई दिनों तक पैदल चलकर मंदिर पहुंचते हैं। इसे भक्ति और समर्पण का प्रतीक माना जाता है।
पंगुनी उथिरम का उत्सव दक्षिण भारत के कई प्रसिद्ध मंदिरों में बड़े पैमाने पर मनाया जाता है।
इन मंदिरों में इस दिन लाखों श्रद्धालु दर्शन करने के लिए पहुंचते हैं और विशेष पूजा-अर्चना में भाग लेते हैं।
धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन व्रत और पूजा करने से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा आती है। भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान मुरुगन की आराधना करने से वैवाहिक जीवन में प्रेम और सामंजस्य बढ़ता है।