Aniruddh Singh
19 Jan 2026
सिंगापुर। एशियाई बाजारों में सोमवार को कच्चे तेल की कीमतों में ज्यादा उतार-चढ़ाव देखने को नहीं मिला और भाव लगभग स्थिर रहे। पिछले सप्ताह तेल बाजार में तेज हलचल देखी गई थी, जिसकी मुख्य वजह ईरान से जुड़ी आपूर्ति बाधित होने की आशंका थी। हालांकि सप्ताह के अंत तक हालात कुछ शांत हुए और निवेशकों का ध्यान अब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से यूरोपीय देशों पर संभावित टैरिफ लगाने की धमकी पर केंद्रित हो गया है। इसी वजह से तेल बाजार फिलहाल सतर्क लेकिन स्थिर रुख में नजर आ रहा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड करीब 64 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बना रहा। अमेरिकी बाजार में सार्वजनिक अवकाश के कारण डब्ल्यूटीआई क्रूड में कारोबार नहीं हुआ। बीते सप्ताह की बात करें तो तेल की कीमतें कुल मिलाकर ऊंचे स्तर पर बंद हुई थीं, लेकिन शुरुआती दिनों की तेज बढ़त बाद में कुछ हद तक कम हो गई।
इसका कारण ट्रंप के वे बयान रहे, जिनमें उन्होंने ईरान से जुड़े हालात पर तत्काल सैन्य कार्रवाई की संभावना से इनकार किया। इससे बाजार में यह संदेश गया कि मध्य पूर्व में तुरंत किसी बड़े टकराव की आशंका नहीं है, और इसी से तेल की कीमतों पर बना दबाव कुछ हल्का पड़ा। पिछले सप्ताह की शुरुआत में ईरान में अस्थिरता को लेकर चिंता बढ़ी थी, जिससे यह डर पैदा हुआ कि मध्य पूर्व से तेल आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। चूंकि यह क्षेत्र वैश्विक तेल उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा प्रदान करता है, इसलिए किसी भी तरह की बाधा की खबर से कीमतों में तेजी आना स्वाभाविक है। लेकिन जब अमेरिका की ओर से सैन्य हस्तक्षेप को लेकर नरम रुख सामने आया, तो बाजार में घबराहट कम हुई और कीमतें स्थिर होने लगीं।
अब बाजार का फोकस व्यापारिक तनावों पर शिफ्ट हो गया है। ट्रंप ने ग्रीनलैंड को लेकर अपनी योजना का विरोध करने वाले आठ यूरोपीय देशों पर टैरिफ लगाने की चेतावनी दी है। इन देशों में फ्रांस, जर्मनी और यूनाइटेड किंगडम जैसे बड़े नाम शामिल हैं। ट्रंप के मुताबिक फरवरी से 10 प्रतिशत टैरिफ लागू किया जा सकता है, जो जून तक बढ़कर 25 प्रतिशत हो सकता है। इससे अमेरिका और यूरोप के बीच बड़े व्यापार विवाद की आशंका पैदा हो गई है। यूरोपीय संघ की प्रतिक्रिया को लेकर भी बाजार में चर्चा तेज है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, यूरोपीय संघ अमेरिका के साथ प्रस्तावित व्यापार समझौते को रोक सकता है और अमेरिकी सामानों पर भारी टैरिफ दोबारा लागू करने पर विचार कर रहा है। यदि ऐसा होता है तो वैश्विक व्यापार और आर्थिक गतिविधियों पर असर पड़ सकता है, जिसका प्रभाव तेल की मांग पर भी पड़ सकता है।