रूटीन हेल्थ चेकअप के दौरान कई बार रिपोर्ट में लिखा होता है कि TSH थोड़ा बढ़ा हुआ है, जबकि T3 और T4 सामान्य हैं। डॉक्टर अक्सर इसे बॉर्डरलाइन थायरॉयड कहते हैं। क्योंकि मरीज को ज्यादा परेशानी महसूस नहीं होती, इसलिए कई लोग इसे नजरअंदाज कर देते हैं। हालांकि, विशेषज्ञों के अनुसार यह स्थिति भविष्य में थायरॉयड की समस्या का संकेत हो सकती है। भारत में थायरॉयड से जुड़ी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं।
साल 2014 में इंडियन जर्नल ऑफ एंडोक्रिनोलॉजी एंड मेटाबॉलिज्म में प्रकाशित एक मल्टी-सिटी स्टडी के अनुसार, भारत में लगभग हर 10 में से 1 वयस्क हाइपोथायरॉयडिज्म से प्रभावित है। इसके अलावा करीब 8 से 9 प्रतिशत लोगों में सबक्लिनिकल हाइपोथायरॉयडिज्म पाया गया है। यह संख्या बताती है कि थायरॉयड से जुड़ी समस्याएं देश में काफी आम होती जा रही हैं।
बॉर्डरलाइन थायरॉयड का मतलब है कि TSH का स्तर सामान्य सीमा से थोड़ा ज्यादा या कम हो, लेकिन T3 और T4 हार्मोन सामान्य सीमा में हों। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, भारत में सबक्लिनिकल थायरॉयड के मामले काफी आम हैं। चूंकि इसके लक्षण हल्के होते हैं, इसलिए लोग इसे अक्सर गंभीरता से नहीं लेते। असल जोखिम किसी एक रिपोर्ट में नहीं बल्कि समय के साथ बदलते हार्मोन स्तर के ट्रेंड में छिपा होता है।
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पहले भारत को आयोडीन की कमी वाला देश माना जाता था। नमक में आयोडीन मिलाने की नीति से स्थिति में सुधार हुआ, लेकिन आयोडीन के स्तर में बदलाव ऑटोइम्यून बीमारियों को भी प्रभावित कर सकते हैं। इसके अलावा हाशिमोटो थायरॉयडाइटिस, बढ़ती उम्र, प्रदूषण, मोटापा और तनाव जैसे कारक भी थायरॉयड की समस्या को बढ़ा सकते हैं।
महिलाएं पुरुषों की तुलना में इस बीमारी से ज्यादा प्रभावित होती हैं। प्रेग्नेंसी की योजना, गर्भावस्था, डिलीवरी के बाद के बदलाव और पेरिमेनोपॉज के दौरान हार्मोन में उतार-चढ़ाव थायरॉयड हार्मोन की जरूरत बढ़ा देते हैं। अगर गर्भावस्था में थायरॉयड नियंत्रित न हो तो यह मां और बच्चे दोनों के लिए जोखिम भरा हो सकता है।
सबसे बड़ी समस्या यह है कि बॉर्डरलाइन या सबक्लिनिकल थायरॉयड में अक्सर स्पष्ट लक्षण नहीं दिखाई देते। हल्की थकान, वजन बढ़ना, बाल झड़ना या मूड में बदलाव जैसी चीजों को लोग सामान्य मान लेते हैं। लेकिन समय के साथ यह स्थिति हाइपोथायरॉयडिज्म में बदल सकती है, खासकर अगर थायरॉयड एंटीबॉडी पॉजिटिव हों।
एक्सपर्ट्स के अनुसार, अगर डॉक्टर सलाह दें तो 6 से 12 हफ्तों के बाद दोबारा थायरॉयड टेस्ट करवाना चाहिए। जरूरत पड़ने पर थायरॉयड एंटीबॉडी टेस्ट भी कराया जा सकता है। इसके अलावा संतुलित मात्रा में आयोडीन लेना, वजन नियंत्रित रखना और महिलाओं को मासिक चक्र पर नजर रखना जरूरी है। हालांकि हर बॉर्डरलाइन केस में दवा जरूरी नहीं होती। इलाज का फैसला मरीज की उम्र, लक्षण और प्रेग्नेंसी की स्थिति को ध्यान में रखकर किया जाता है।