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NCPI :एक भी प्रत्याशी चुनाव नहीं जीता...अब राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में है यह पार्टी, अब 20 सांसदों के साथ मिलेगी पहचान

नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) का गठन चार साल पहले 2022 में किया गया था। पार्टी ने 2023 में चुनाव लड़ा, लेकिन इसका कोई प्रत्याशी जीत हासिल नहीं कर सका। इस पार्टी को बहुत कम लोग जानते थे, लेकिन अब टीएमसी (TMC) के सांसदों का गुट इसमें मिलने जा रहा है तो पूरे देश में  पूछा जा रहा है कि यह पार्टी कहां की है, कौन इसके नेता हैं? जानिए NCPI की कहानी।
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एक भी प्रत्याशी चुनाव नहीं जीता...अब राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में है यह पार्टी, अब 20 सांसदों के साथ मिलेगी पहचान
NCPI का मुख्यालय हावड़ा में है

नेशनल डेस्क। पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों एक ऐसी पार्टी का नाम तेजी से चर्चा में है, जिसके बारे में कुछ दिन पहले तक राजनीतिक जानकार भी बहुत कम जानते थे। नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) अचानक सुर्खियों में आ गई है क्योंकि दावा किया जा रहा है कि तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 सांसद इस पार्टी में विलय कर सकते हैं। यदि ऐसा होता है तो अब तक लगभग गुमनाम रही यह पार्टी राष्ट्रीय राजनीति में एक बड़ी पहचान हासिल कर सकती है।

पूर्वोत्तर राज्यों में सीमित मौजूदगी 

NCPI की मौजूदगी मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल, असम और त्रिपुरा जैसे राज्यों तक सीमित रही है। नाम की समानता के कारण कई लोग इसे शरद पवार की NCP या बांग्लादेश की NCP से जोड़कर देख रहे हैं, लेकिन इन तीनों संगठनों का आपस में कोई संबंध नहीं है। बांग्लादेश की NCP छात्र आंदोलन से निकली पार्टी है, जबकि भारत की NCPI एक अलग राजनीतिक संगठन के रूप में काम करती रही है।

TMC सांसदों के विलय पर पार्टी की प्रतिक्रिया 

पार्टी के संस्थापक और राष्ट्रीय संगठन सचिव शांतनु डे ने TMC सांसदों के संभावित विलय का स्वागत किया है। उन्होंने बताया कि इस मुद्दे पर पार्टी नेताओं की ऑनलाइन बैठक हुई थी। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि पार्टी नेतृत्व की ओर से उन्हें अभी तक कोई आधिकारिक जानकारी नहीं मिली है। डे के अनुसार, पार्टी 2023 में सक्रिय रूप से संगठित हुई थी, लेकिन आर्थिक कठिनाइयों के कारण इसका विस्तार सीमित रहा।

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चुनाव आयोग में पंजीकृत लेकिन मान्यता नहीं 

भारत निर्वाचन आयोग के रिकॉर्ड के अनुसार NCPI वर्ष 2022 से एक पंजीकृत लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल है। ऐसे दलों को चुनाव आयोग तब तक क्षेत्रीय या राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा नहीं देता, जब तक वे चुनावों में निर्धारित वोट प्रतिशत हासिल नहीं कर लेते। यही वजह है कि अब तक पार्टी राजनीतिक मुख्यधारा से काफी दूर रही।

2023 के त्रिपुरा चुनाव में मिली करारी हार 

NCPI ने वर्ष 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में अपनी राजनीतिक किस्मत आजमाई थी। पार्टी ने कुछ सीटों पर उम्मीदवार उतारे, लेकिन उसे बेहद निराशाजनक परिणाम मिले। चुनावों में पार्टी के उम्मीदवार नोटा से थोड़ा ही अधिक वोट प्राप्त कर सके। चावमानु और कैलाशहर सीटों पर चुनाव लड़ते हुए पार्टी को कुल 822 वोट मिले, जो कुल मतों का मात्र 0.03 प्रतिशत था। इसके बावजूद पार्टी ने पूर्वोत्तर में संगठन विस्तार की कोशिशें जारी रखीं।

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कौन हैं पार्टी की प्रमुख चेहरे? 

NCPI की अध्यक्ष शेवली कुंडू हैं, जो पेशे से कलकत्ता हाईकोर्ट की अधिवक्ता हैं। पार्टी के महासचिव सल्कट दास और कोषाध्यक्ष सुदाम जेटी हैं। वहीं, शेवली कुंडू के पति उत्तिया कुंडू उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी संभालते हैं और पेशे से शिक्षक हैं। पार्टी का नेतृत्व अब तक अपेक्षाकृत कम चर्चित चेहरों के हाथों में रहा है।

दलबदल विरोधी नारे से बनी थी पहचान 

दिलचस्प बात यह है कि 2023 के विधानसभा चुनाव के दौरान एनसीपीआई ने दलबदल के खिलाफ अभियान चलाया था। पार्टी का नारा था-अपने अधिकारों की रक्षा के लिए राजनीतिक दलबदलुओं को अस्वीकार करें। चुनावी पोस्टरों में भी राजनीतिक अवसरवाद के खिलाफ संदेश दिया गया था। यही कारण है कि अब बड़े पैमाने पर संभावित राजनीतिक विलय के कारण पार्टी का चर्चा में आना कई लोगों को हैरान कर रहा है।

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पार्टी के पुराने नेता भी हैं चकित 

त्रिपुरा के चावमानु क्षेत्र से चुनाव लड़ चुके पार्टी उम्मीदवार बरजेदा त्रिपुरा भी मौजूदा घटनाक्रम से आश्चर्यचकित हैं। उन्होंने कहा कि 2023 में जब उन्होंने पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा था, तब किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि एक दिन राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी का नाम इतनी बड़ी राजनीतिक चर्चा का विषय बनेगा। एक दिहाड़ी मजदूर रहे बरजेदा का कहना है कि उन्हें अब भी विश्वास नहीं हो रहा कि जिस पार्टी से वे जुड़े थे, वह अचानक राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गई है।

बदल सकती है पश्चिम बंगाल की राजनीतिक तस्वीर 

यदि TMC के सांसदों का प्रस्तावित विलय वास्तव में होता है, तो NCPI का राजनीतिक कद एक झटके में कई गुना बढ़ सकता है। अब तक चुनावी सफलता से दूर रही यह पार्टी राष्ट्रीय राजनीति में नई शक्ति के रूप में उभर सकती है। हालांकि, अंतिम तस्वीर तभी साफ होगी जब विलय को लेकर आधिकारिक घोषणा और संवैधानिक प्रक्रियाएं पूरी हो जाएंगी।

Naresh Bhagoria
By Naresh Bhagoria

नरेश भगोरिया। 27 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हूं। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्ववि...Read More

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