High Court News : धनकुबेर सौरभ शर्मा की मां को फिलहाल राहत नहीं, जवाब पेश करने शासन और प्रशासन को आखिरी मोहलत

जबलपुर। भोपाल के धनकुबेर सौरभ शर्मा की मां उमा शर्मा को फिलहाल हाईकोर्ट से राहत नहीं मिली है। उमा शर्मा द्वारा शाहपुरा कॉलोनी के सेक्टर बी में बनाए जा रहे स्कूल को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर एक्टिंग चीफ जस्टिस विवेक रूसिया व जस्टिस प्रदीप मित्तल की डिवीजन बेंच ने मंगलवार को मामले पर जवाब पेश करने शासन और प्रशासन को आखिरी मोहलत प्रदान की है। अगली सुनवाई 29 जुलाई को होगी।
कोर्ट ने दिए थे यथास्थिति के निर्देश
शाहपुरा कॉलोनी हाउस ओनर्स एसोसिएशन की अध्यक्ष शुभ्रा गोयल की ओर से दायर इस याचिका में कहा गया है कि कॉलोनी के सेक्टर बी में 19942 वर्गफुट जमीन ओपन स्पेस के रूप में आरक्षित थी। 15 मार्च 2024 को
किसी भी अनावेदक का जवाब पेश नहीं
मामले पर मंगलवार को आगे हुई सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा मेनन व अधिवक्ता राहुल चौबे ने पक्ष रखा। मेनन ने युगलपीठ को बताया कि अभी तक इस मामले में किसी भी अनावेदक की ओर से जवाब पेश नहीं किया गया है। यह स्कूल उस सौरभ शर्मा की मां का है, जो हाल ही में धनकुबेर के रूप में जांच एजेन्सियों के रडार पर है। सुनवाई के बाद युगलपीठ ने अनावेदकों को जवाब के लिए आखिरी मोहलत देकर सुनवाई मुल्तवी कर दी।
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‘पुलिस जांच में 9 साल की देरी आरोपी के मौलिक अधिकार का हनन’
वहीं, ओरछा के विश्व प्रसिद्ध श्री राम राजा सरकार मंदिर में हुए कथित वित्तीय घोटाले के मामले में पुलिस की कार्यप्रणाली पर मप्र हाईकोर्ट ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है। जस्टिस हिमान्शु जोशी की सिंगल बेंच ने पुलिस जांच में हुई 9 साल की असाधारण और अत्यधिक देरी को नागरिक के मौलिक अधिकारों का हनन मानकर मंदिर के एक लिपिक मुन्नालाल तिवारी के खिलाफ दर्ज एफआईआर को निरस्त कर दिया है।
मंदिर की संपत्तियों में हेराफेरी का आरोप
वर्ष 2017 में एक संयुक्त जांच समिति की रिपोर्ट के आधार पर थाना ओरछा (जिला निवाड़ी) में मंदिर की संपत्तियों, दान राशि, आभूषणों और रिकॉर्ड में हेराफेरी के आरोपों को लेकर विभिन्न धाराओं के तहत मंदिर के लिपिक के खिलाफ 10 सितंबर 2017 को एफआईआर दर्ज की गई थी। इस एफआईआर को चुनौती देकर लिपिक मुन्नालाल तिवारी ने यह पुनरीक्षण याचिका वर्ष 2019 में हाईकोर्ट में दाखिल की थी।
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पुलिस की भूमिका पर नाराजगी
मामले पर हुई सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मनोज शर्मा व अधिवक्ता काजी फखरुद्दीन ने दलीलें रखीं। सुनवाई के बाद 12 मई को बेंच ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। सुनवाई के बाद सुनाए फैसले में अदालत ने इस मामले में पुलिस की भूमिका पर कड़ी नाराजगी जताई। बेंच ने कहा कि प्रशासनिक कठिनाइयां और दस्तावेजों को जुटाना, जांच को एक दशक तक खींचने का कानूनी बहाना नहीं बन सकते। सुप्रीम कोर्ट की नजीरों का हवाला देकर अदालत ने कहा कि यदि पुलिस सालों-साल जांच पूरी नहीं करती, तो यह सीधे तौर पर कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है। इस मत के साथ अदालत ने याचिकाकर्ता के खिलाफ दर्ज एफआईआर और उसके आधार पर चल रही कार्रवाईयों को निरस्त कर दिया।












