जज जितेंद्र सिंह ने बीते शुक्रवार को बहुत दिनों से लंबित दिल्ली घोटाला केस पर अपना बड़ा फैसला दिया। उन्होंने इस केस में उलझे दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया को बड़ी राहत दी। उन्हें सबूतों की कमी के आधार पर पूरी तरह से इस लंबित केस से बरी करते हुए निर्दोष करार दिया।
जज जितेंद्र सिंह ने सीबीआई की चार्जशीट पर संज्ञान लेने से इनकार कर दिया। उन्होंने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि जांच एजेंसी अभियुक्तों के खिलाफ "आपराधिक मंशा" या "साज़िश" के ठोस सबूत पेश करने में पूरी तरह से नाकाम रही है। कोर्ट ने विशेष टिप्पणी देते हुए कहा कि "केवल अनुमानों के आधार पर किसी संवैधानिक व राजनीतिक पद पर बैठे व्यक्ति के ख़िलाफ़ इतना संगीन मुकदमा चलाना भी अपने आप में अपराध है। अदालत ने यह भी कहा कि सबूतों की कमी के कारण अभियुक्तों को लंबे समय तक मुकदमे की प्रक्रिया में उलझाए रखना कोर्ट के और व्यक्ति विशेष के समय की बर्बादी है।
जज जितेंद्र सिंह को कानून की सही प्रक्रियाओं, ख़ासकर 'प्रॉसिक्यूशन सैंक्शन' (मुकदमा चलाने के लिए ज़रूरी अनुमति) के मामले में सिद्धांतों पर अडिग रहने वाला न्यायाधीश माना जाता है।
पहले के लिए गए उनके कुछ फैसले इसका बड़ा उदाहरण हैं-
दिल्ली वक़्फ़ बोर्ड मामला: (नवंबर 2024) में जितेंद्र सिंह ने AAP पार्टी के विधायक अमानतुल्लाह ख़ान को रिहा करने का आदेश दिया था। हालांकि जज ने माना था कि अभियुक्त के खिलाफ अभी भी साक्ष्य मौजूद हैं, लेकिन उन्होंने केवल इस तकनीकी आधार पर संज्ञान लेने से मना कर दिया क्योंकि इसके लिए (ईडी) ने ज़रूरी 'सरकारी अनुमति' नहीं ली थी। साथ ही जज जितेंद्र सिंह ने अपने आदेशों में बार-बार यह स्पष्ट किया है कि बिना उचित कानूनी प्रक्रिया और अनिवार्य अनुमति के किसी भी व्यक्ति को हिरासत में लंबे समय तक ना रखा जाए, यह पूरी तरह से अवैध है।
ये भी पढ़ें: अरविंद केजरीवाल ने दिया चैलेंज... 'अगर BJP की 10 से ज्यादा सीट आ गईं तो राजनीति छोड़ दूंगा'
वर्तमान में जज जितेंद्र सिंह कांग्रेस नेता जगदीश टाइटलर के ख़िलाफ़ 1984 के सिख विरोधी दंगों (पुल बंगश मामला) की सुनवाई भी कर रहे हैं। इस पूरे मसले पर उन्होंने पीड़ित परिवारों और गवाहों की सुरक्षा को लेकर कई महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं। उन्होंने इस मामले में 40 साल बाद चश्मदीद गवाहों के बयान दर्ज करने की प्रक्रिया को सुचारू बनाया और वॉइस सैंपल रिपोर्ट को रिकॉर्ड पर लेकर यह सुनिश्चित किया कि दशकों पुराने इस मामले में इंसाफ़ की प्रक्रिया पारदर्शी बनी रहे। अपनी अदालतों में जांच एजेंसियों की कमियों को उजागर करने के लिए जज जितेंद्र सिंह अक्सर चर्चा में बने रहते हैं। आबकारी मामले में उन्होंने 'सरकारी गवाह' बनाने की सीबीआई की रणनीति पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि अगर जांच की ख़ामियों को भरने के लिए इस तरह के गवाहों का इस्तेमाल किया जाता है, तो यह सिर्फ खुद के साथ नहीं बल्कि संविधान के साथ भी उल्लंघन है।