राष्ट्रपति शिक्षक पुरस्कार के लिए शैलेंद्र सिंह का चयन–‘घर-घर संपर्क साधा, विद्यालय को सुरक्षित व आकर्षक बनाया तब 3 से 202 हुए स्कूल में छात्र’

संजय दुबे, जबलपुर। शासकीय प्राथमिक शाला अगरियान टोला कंजवार में महज तीन बच्चों से शुरू हुई शैलेंद्र सिंह की शिक्षकीय यात्रा अब 202 विद्यार्थियों तक पहुंच चुकी है। नवाचार, जनभागीदारी और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के प्रयासों के लिए राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार 2026 के लिए चयनित शैलेंद्र सिंह ने अपनी सफलता, संघर्ष और प्रेरणा की कहानी पीपुल्स समाचार से साझा की। प्रस्तुत है उनसे हुई खास बातचीत के प्रमुख अंश…
शैलेंद्र सिंह: बहुत-बहुत धन्यवाद। यह सम्मान केवल मेरा नहीं, बल्कि उन सभी बच्चों, अभिभावकों और ग्रामीणों का है जिन्होंने मुझ पर और इस विद्यालय पर भरोसा जताया।
प्रश्न 2: 2011 में जब सिर्फ 3 बच्चे आते थे, तब से लेकर 202 विद्यार्थियों तक का सफर कैसे तय हुआ?
शैलेंद्र सिंह: जब 22 अक्टूबर 2011 को मैंने शासकीय प्राथमिक शाला अगरियान टोला कंजवार में कदम रखा, तो स्थिति बेहद चुनौतीपूर्ण थी। जर्जर भवन और बच्चों की स्कूल से दूरी सबसे बड़ी चुनौती थी। घर-घर संपर्क साधा, विद्यालय को सुरक्षित व आकर्षक बनाया और पढ़ाई की गुणवत्ता सुधारी। अपनत्व और बेहतर माहौल से बच्चों का ठहराव बढ़ा और दर्ज संख्या 202 तक पहुंच गई।
प्रश्न 3: 'पोषण वाटिका' और जनभागीदारी के नवाचार ने स्कूल को कैसे बदला?
शैलेंद्र सिंह: 'स्वस्थ तन में स्वस्थ मन' के ध्येय से हमने पोषण वाटिका बनाई, जहाँ उगी ताजी सब्जियाँ मध्यान्ह भोजन में दी जाती हैं। इससे बच्चों का पोषण स्तर सुधरा। वहीं जनभागीदारी से करीब 5 लाख रुपए, विधायक निधि से 25 लाख रुपए और शासन से 51 लाख रुपए का सहयोग मिला, जिससे बाउंड्रीवाल, भवन और फर्नीचर जैसी बुनियादी सुविधाएँ संभव हुईं।
प्रश्न 4: शैक्षणिक उपलब्धियों और शोध कार्यों पर क्या कहेंगे?
शैलेंद्र सिंह: हमने व्यावहारिक शिक्षा पर जोर दिया, जिससे 4 बच्चे नवोदय और 2 ओलंपियाड में चयनित हुए। अध्यापन को प्रभावी बनाने के लिए मैंने 6 क्रियात्मक शोध किए व दो पुस्तकें भी लिखीं। इससे पहले मुझे 2023 में 'राज्य स्तरीय शिक्षक सम्मान' और 2026 में 'स्टार ऑफ द मंथ' से भी नवाजा जा चुका है।
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प्रश्न 5: आपकी इस पूरी यात्रा में आपकी सबसे बड़ी प्रेरणा और पारिवारिक संबल क्या रहा है?
शैलेंद्र सिंह: मेरे पिता रामदेव सिंह भी शिक्षक थे, इसलिए अध्यापन मेरे संस्कारों में ही रहा। मेरी माता प्रेमवती सिंह के आशीर्वाद और मेरी धर्मपत्नी पूनम सिंह के निरंतर सहयोग ने मुझे हमेशा मजबूती दी। मेरे दोनों बेटे-यश प्रताप सिंह और शौर्य प्रताप सिंह मेरी इस यात्रा के साक्षी और ताकत हैं। इसके अलावा स्वामी विवेकानंद के विचारों ने मुझे हमेशा प्रेरित किया। उनका एक विचार मेरे जीवन का मूलमंत्र है-'स्वयं को कमजोर समझना सबसे बड़ा पाप है और संघर्ष जितना बड़ा होगा, सफलता उतनी ही शानदार होगी।'
प्रश्न 6: अन्य शिक्षकों के लिए आपका क्या संदेश है?
शैलेंद्र सिंह: साधन सीमित हो सकते हैं, पर संकल्प दृढ़ होना चाहिए। यदि एक शिक्षक पूरी निष्ठा से काम करे, तो वह पूरे समाज की सोच और तस्वीर बदल सकता है। स्वामी विवेकानंद के शब्दों में-'संघर्ष जितना बड़ा होगा, जीत उतनी ही शानदार होगी।'
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