PlayBreaking News

'मर्यादा भंग', 'पवित्रता खो दी'…जैसे शब्दों का नही होगा इस्तेमाल, जजों के लिए सुप्रीम कोर्ट की नई गाइडलाइन

समिति का मानना है कि ऐसी भाषा पुरानी सोच को बढ़ावा देती है और पीड़ित को दोबारा मानसिक आघात पहुंचा सकती है। ऐसे में किसी महिला के कपड़ों या व्यवहार के आधार पर उसके चरित्र का आकलन करना पूरी तरह गलत और अस्वीकार्य है।
Follow on Google News
जैसे शब्दों का नही होगा इस्तेमाल, जजों के लिए सुप्रीम कोर्ट की नई गाइडलाइन
किसी महिला के कपड़ों या व्यवहार के आधार पर उसके चरित्र का आकलन करना पूरी तरह गलत और अस्वीकार्य है।

सुप्रीम कोर्ट ने देशभर के जजों के लिए नई गाइडलाइंस जारी की हैं। कोर्ट ने कहा है कि रेप और यौन उत्पीड़न के मामलों में फैसला लिखते समय ऐसी भाषा का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए, जिससे पीड़िता को दोषी ठहराया जाए या उसकी गरिमा को ठेस पहुंचे। अदालतों को ऐसे मामलों में संवेदनशील और पीड़ित-केंद्रित नजरिया अपनाना चाहिए।

ये गाइडलाइंस सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस अनिरुद्ध बोस की अध्यक्षता में बनी विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट पर आधारित हैं। समिति ने देशभर की ट्रायल कोर्ट के 125 फैसलों का अध्ययन करने के बाद यह रिपोर्ट तैयार की है। रिपोर्ट का नाम ‘जजमेंट्स एंड जेंडर: सेंसिटिविटी एंड कम्पैशन इन राइटिंग जजमेंट्स’ रखा गया है।

इन शब्दों के इस्तेमाल से बचने की सलाह

रिपोर्ट में कहा गया है कि फैसलों में 'प्रोसिक्यूट्रिक्स', 'बेबस महिला', 'पवित्रता खो दी' और 'मर्यादा भंग' जैसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। समिति का मानना है कि ऐसी भाषा पुरानी सोच को बढ़ावा देती है और पीड़ित को दोबारा मानसिक आघात पहुंचा सकती है। इसके बजाय 'पीड़ित', 'सर्वाइवर', 'शिकायतकर्ता', 'यौन उत्पीड़न' और 'शरीर पर अपना अधिकार' जैसे कानूनी रूप से सही शब्दों का इस्तेमाल करने की सलाह दी गई है।

ये भी पढ़ें: हवा में 300 फीट नीचे गिरा एयर इंडिया का विमान ! फुकेट-दिल्ली फ्लाइट में मची चीख-पुकार, 14 घायल

भावनात्मक नहीं, तथ्य आधारित भाषा अपनाने पर जोर

समिति ने जजों से कहा है कि 'बेचारी नाबालिग लड़की', 'हवस का शिकार', 'जिंदगी बर्बाद हो गई' जैसे भावनात्मक शब्दों से बचें। फैसलों की भाषा ऐसी होनी चाहिए जो अपराध और उसके प्रभाव पर केंद्रित हो, न कि नैतिक टिप्पणी करने वाली।

शिकायत में देरी या चोट न होना सहमति नहीं

रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि अगर पीड़िता ने शिकायत दर्ज कराने में देरी की है, विरोध नहीं किया है या उसके शरीर पर चोट के निशान नहीं मिले हैं, तो इसका मतलब यह नहीं है कि उसने सहमति दी थी। हर व्यक्ति किसी दर्दनाक घटना पर अलग-अलग तरीके से प्रतिक्रिया देता है, इसलिए ऐसे मामलों में किसी तरह की पूर्वधारणा नहीं बनानी चाहिए।

Breaking News

'रेप' को 'शारीरिक संबंध' न लिखा जाए

समिति ने कहा है कि बिना सहमति वाले मामलों या नाबालिगों से जुड़े मामलों में 'शारीरिक संबंध' जैसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। इसकी जगह 'रेप', 'यौन हमला' या 'यौन हिंसा' जैसे स्पष्ट और कानूनी शब्दों का इस्तेमाल किया जाए।

कोर्ट में सम्मानजनक व्यवहार सुनिश्चित करने के निर्देश

गाइडलाइंस में यह भी कहा गया है कि कोर्ट में पीड़ित से उसके कपड़ों, निजी जिंदगी, पुराने रिश्तों या यौन इतिहास से जुड़े अपमानजनक सवाल पूछने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। किसी महिला के कपड़ों या व्यवहार के आधार पर उसके चरित्र का आकलन करना पूरी तरह गलत और अस्वीकार्य है।

ये भी पढ़ें: FSSAI का डाबर पर बड़ा एक्शन! अब 100% शुद्ध लिखकर नहीं बेच सकेंगे प्रोडक्ट, शहद-घी समेत कई पर रोक

125 फैसलों के अध्ययन के बाद तैयार हुई रिपोर्ट

यह विशेषज्ञ समिति 10 फरवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के बाद बनाई गई थी। समिति ने देशभर की ट्रायल कोर्ट के 125 फैसलों का अध्ययन करने के बाद यह रिपोर्ट तैयार की है। रिपोर्ट में जजों के नियमित प्रशिक्षण और न्यायिक प्रक्रिया में संवेदनशीलता बढ़ाने पर भी जोर दिया गया है।

Dolly Wasvani
By Dolly Wasvani
नई दिल्ली
--°
बारिश: -- mmह्यूमिडिटी: --%हवा: --
Source:AccuWeather
icon

Latest Posts