मध्यप्रदेश में खुली जेलों की निगरानी के लिए राज्य स्तरीय समिति गठित, रिटायर्ड जस्टिस अलोक वर्मा होंगे अध्यक्ष

भोपाल। जेलों में कैदियों की बढ़ती संख्या और बंदियों के मानवीय पुनर्वास को लेकर सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद मध्यप्रदेश में खुली जेल व्यवस्था की निगरानी के लिए राज्य स्तरीय समिति के गठन की प्रक्रिया पूरी हो गई है। सामान्य प्रशासन विभाग के आदेश के तहत मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस अलोक वर्मा की अध्यक्षता में समिति गठित की गई है। समिति में जेल विभाग के अतिरिक्त सचिव और महानिदेशक जेल सदस्य होंगे। समिति का मुख्य काम प्रदेश में संचालित खुली जेलों की व्यवस्था की समीक्षा करने के साथ इनके विस्तार, पात्र बंदियों के स्थानांतरण और पुनर्वास से जुड़ी व्यवस्थाओं की निगरानी करना होगा।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद बनी समिति
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने सुहास चकमा बनाम केंद्र सरकार मामले में जेलों में क्षमता से अधिक बंदियों की समस्या को गंभीरता से लिया था। जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस कवि विश्वनाथन की पीठ ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को अपनी जेल व्यवस्था का व्यापक आकलन करने के निर्देश दिए थे। कोर्ट ने नई खुली जेल या सुधार गृह स्थापित करने की संभावनाओं पर विचार करने के साथ मौजूदा जेलों में खुले बैरक विकसित करने की संभावनाएं तलाशने को भी कहा था। इसी क्रम में मध्यप्रदेश में राज्य स्तरीय समिति का गठन किया गया है।
खुली जेलों की व्यवस्था की करेगी समीक्षा
राज्य स्तरीय समिति प्रदेश में खुली जेलों के संचालन और उपलब्ध सुविधाओं की समीक्षा करेगी। इसके साथ ही यह भी देखा जाएगा कि मौजूदा व्यवस्था में कितनी क्षमता है और भविष्य में नई खुली जेलों की जरूरत कहां है।
समिति की प्रमुख जिम्मेदारियों में-
- प्रदेश में खुली जेलों की मौजूदा व्यवस्था और क्षमता की समीक्षा।
- नई खुली जेलों की जरूरत और उनकी संभावनाओं का आकलन।
- मौजूदा जेलों में खुले बैरक विकसित किए जाने की संभावनाओं की समीक्षा।
- पात्र बंदियों को बंद जेलों से खुली संस्थाओं में स्थानांतरित करने की प्रक्रिया की निगरानी।
- खुली जेलों में उपलब्ध खाली स्थानों के बेहतर उपयोग की समीक्षा।
- बंदियों के पुनर्वास और सुधारात्मक कार्यक्रमों की निगरानी।
- सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के पालन की समीक्षा।
संबंधित हाईकोर्ट के समक्ष नियमित अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करना शामिल है।
बंद जेल से बाहर आने का रास्ता देती है खुली जेल व्यवस्था
खुली जेल का उद्देश्य सभी बंदियों को सामान्य जेल व्यवस्था से बाहर करना नहीं है। इसमें निर्धारित मानकों के आधार पर पात्र बंदियों को अपेक्षाकृत खुले वातावरण में रहने और काम करने का अवसर दिया जाता है। इस व्यवस्था का मकसद बंदियों को सजा पूरी होने के बाद सामान्य सामाजिक जीवन में लौटने के लिए तैयार करना है। सुप्रीम कोर्ट ने भी खुली जेलों को केवल जेलों में भीड़ कम करने के साधन के तौर पर नहीं देखा है, बल्कि इसे सुधार और पुनर्वास आधारित व्यवस्था के रूप में विकसित करने पर जोर दिया है।
महिला बंदियों को भी अवसर देने पर जोर
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों में महिला बंदियों के लिए भी खुली जेल व्यवस्था के अवसर पर ध्यान दिया गया है। कोर्ट ने उन राज्यों को अपनी पात्रता संबंधी व्यवस्थाओं की समीक्षा करने को कहा है, जहां महिला बंदियों को खुली जेल का लाभ उपलब्ध नहीं है। जरूरत के अनुसार महिला बंदियों के लिए अलग खुले बैरक विकसित करने की दिशा में भी कदम उठाने के निर्देश दिए गए हैं। इसका उद्देश्य पुनर्वास की प्रक्रिया में महिला बंदियों को भी समान अवसर उपलब्ध कराना है।
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क्या होती है खुली जेल?
खुली जेल पारंपरिक बंद जेल से अलग व्यवस्था होती है। इसमें पात्र बंदियों को नियंत्रित लेकिन अपेक्षाकृत खुले वातावरण में रहने और काम करने का अवसर दिया जाता है। यहां बंदियों को जिम्मेदारी के साथ सामान्य जीवन के करीब रहने का अनुभव मिलता है। इस व्यवस्था का प्रमुख उद्देश्य सजा पूरी होने के बाद बंदी को समाज में दोबारा शामिल होने के लिए तैयार करना है। इसी वजह से खुली जेल व्यवस्था को जेल सुधार, मानवीय गरिमा और सामाजिक पुनर्समावेशन से जोड़ा जाता है।
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पहले जिम्मेदारियों का अध्ययन जरूरी
समिति के अध्यक्ष बनाए गए सेवानिवृत्त जस्टिस अलोक वर्मा ने कहा कि सरकार की ओर से की गई नियुक्ति का आदेश हाल ही में प्राप्त हुआ है। उन्होंने कहा कि समिति को सौंपी गई जिम्मेदारियों का पहले अध्ययन करना होगा। इसके बाद ही समिति की भूमिका और कामकाज को लेकर विस्तार से जानकारी दी जा सकेगी। मध्यप्रदेश में इस समिति के गठन के बाद अब प्रदेश की खुली जेल व्यवस्था, पात्र बंदियों के पुनर्वास और मौजूदा जेलों में खुले बैरक विकसित करने की संभावनाओं को लेकर आगे की प्रक्रिया पर नजर रहेगी।



















