नक्सलमुक्त जिलों में भी तैनात रहेंगे जवान:ढाई हजार जवानों की नहीं होगी वापसी; मंडला, डिंडौरी में फोर्स रहेगा तैनात

विजय एस. गौर, भोपाल। नक्सल समस्या खत्म होने के बाद भी फोर्स की वापसी फिलहाल टाल दी गई है। 332 करोड़ की विकास योजना के जरिए 100 गांवों में काम होगा। पुलिस सर्चिंग के साथ ही सामाजिक संवाद भी बढ़ा रही है। विद्याजंलि योजना के तहत शिक्षा और विश्वास बहाली पर खास फोकस है।
नक्सलमुक्त के बाद भी तैनात रहेगा फोर्स
प्रदेश के बालाघाट, मंडला और डिंडौरी जिलों के नक्सलमुक्त होने के बाद भी ढाई हजार जवान अभी ज्यों के त्यों वहीं रहेंगे। यह पुलिस के जवान और अधिकारियों की टीम अब गांव-गांव में चौपालें लगाकर शिक्षा, स्वास्थ्य और पुनर्वास में जुटी है, ताकि नक्सलियों के खात्मे के बाद भी कहीं नक्सली विचारधारा फिर से न पनपे। दरअसल यह रणनीति सिर्फ सुरक्षा बनाए रखने के लिए नहीं बल्कि स्थायी शांति सुनिश्चित करने के लिए अपनाई गई है। पुलिस अब सामाजिक जुड़ाव के जरिए लोगों के बीच विश्वास कायम कर रही है। इसके चलते ग्रामीणों में भी सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहा है।
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ढाई हजार जवानों की तैनाती
दरअसल बालाघाट, मंडला और डिंडौरी जिलों में हॉकफोर्स के एक हजार से ज्यादा जवान, आधुनिक हथियार, वाहनों के साथ तैनात किए गए थे। साथ ही एसएसटी (स्पेशल सपोर्ट टीम) के तहत एक हजार आदिवासी युवाओं की भी भर्ती की गई थी। इस तरह करीब 2500 हजार जवान इन जिलों में है। इस फोर्स को नक्सल समस्या के खात्मे के साथ ही वापसी करके बटालियन और जिलों में पदस्थ किया जाना था। हालांकि अब ऐसा आगे कई साल तक नहीं हो सकेगा। बल्कि तीनों जिलों के 100 गांवों के लिए 332 करोड़ की विकास योजना को मूर्तरुप में लाएंगे।
सर्चिंग के साथ गांव-गांव चौपालें
सरकार ने पुनर्वास से पुनर्जीवन अभियान के तहत नक्सलियों के सरेंडर और पुलिस के विशेष प्रयासों से समस्या समाप्त कर दी है। फिर भी पुलिस अभी भी जंगलों और रास्तों पर सर्चिंग में जुटी है, जिसके लिए 10-10 जवानों की टीमों का मूवमेंट रहता है। इसी के साथ रात में ही आत्मसमर्पित या मारे गए नक्सलियों के परिवारों से सक्रिय संवाद रखा जा रहा है। ताकि फिर से नक्सलवाद ना पनपे। गांव-गांव में चौपालें की जा रही हैं, जिनमें गांव की छोटी-छोटी समस्याओं के बारे में संबंधित विभागों तक पहुंचाकर निराकरण करवाया जा रहा है।
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ग्रामीण विकास और खेल गतिविधियों पर जोर
गांवों के बीच ग्राम खेल भी शुरु करवाए गए हैं। इन गतिविधियों के माध्यम से युवाओं को सकारात्मक दिशा देने का प्रयास किया जा रहा है। पुलिस अब सिर्फ सुरक्षा एजेंसी नहीं बल्कि सामाजिक बदलाव की कड़ी बनती नजर आ रही है। ग्रामीणों को सरकारी योजनाओं से जोड़ने का काम भी तेजी से किया जा रहा है। इससे गांवों में विकास की गति बढ़ रही है। साथ ही लोगों में प्रशासन के प्रति भरोसा भी मजबूत हो रहा है।
विद्याजंलि योजना पर फोकस
नक्सलियों के कारण स्कूल और सड़कें आदि का निर्माण नहीं हो सका और जो पहले से बने थे, उनकी मरम्मत भी नही हुई। ऐसे में विद्याजंलि योजना के तहत गांवों के पुराने और टूटे स्कूलों की मरम्मत करवाने के साथ प्रत्येक बच्चे को स्कूल लाया जा रहा है। इसके लिए पुलिस टीमें गांवों में रात्रि चौपालें कर रही हैं। खासकर बैगा जनजाति, जोकि स्कूलों और विकास से कोसों दूर थी, उसको समझाकर अब चौपालों से जोड़ा जा रहा है। इससे शिक्षा के क्षेत्र में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है।
आदिवासी समाज को मुख्यधारा से जोड़ने की पहल
खासकर बैगा जैसी जनजातियां को पहली बार विकास योजनाओं से जोड़ा जा रहा है। पुलिस और प्रशासन मिलकर इन समुदायों को जागरूक करने में जुटे हैं। उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के अवसरों से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। चौपालों के जरिए संवाद बढ़ाया जा रहा है ताकि उनकी समस्याएं सीधे सुनी जा सकें। इससे इन इलाकों में सामाजिक समावेशन को बढ़ावा मिल रहा है। आने वाले समय में इसका सकारात्मक प्रभाव देखने को मिलेगा।
बालाघाट आईजी ललित शाक्यवार ने क्या कहा ?
नक्सल मुक्त को लेकर बालाघाट आईजी ललित शाक्यवार ने बताया कि नक्सली उन्मूलन तो हो गया है, लेकिन अभी भी उनकी विचाराधारा तो है। ऐसे में फिर से समस्या न हो, इसके लिए पुलिस कई मोर्चों पर सक्रिय होने के साथ ही लगातार सर्चिंग पर रहती है। पुलिस का काम अब पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गया है। इसी के साथ उन्होंने बताया कि पुलिस विश्वास बहाली के साथ ही डेवलपमेंट के काम करवा रही है।












