जबलपुर। मप्र हाईकोर्ट ने बुधवार को बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा है कि बॉन्ड के नाम पर डॉक्टरों को बंधक नहीं बनाया जा सकता। यदि सुपर स्पेशियलिटी कोर्स के लिए किसी डॉक्टर का सिलेक्शन हुआ है, तो उसे उसके दस्तावेज सरकारी मेडिकल कॉलेजों को लौटाना चाहिए। इस मत के साथ जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की डिवीजन बेंच ने यह भी कहा कि जिस संस्थान में डॉक्टर, सुपर स्पेशियलिटी कोर्स में प्रवेश लेंगे, वहीं उनके मूल दस्तावेज सुरक्षित रखे जाएंगे, जो ग्रामीण सेवा पूरी होने के बाद ही वापस किए जाएं। बेंच ने स्पष्ट कर दिया है कि यह आदेश उन सभी छात्रों पर लागू होगा, जो सुपर स्पेशियलिटी कोर्स में दाखिला लेने वाले हैं। यानी सभी सरकारी मेडिकल कॉलेजों को दस्तावेज लौटाने होंगे।
डिवीजन बेंच ने यह फैसला इंदौर की छात्रा डॉ. शिल्पी गर्ग और 7 अन्य की ओर से दाखिल याचिका पर दिया। आवेदकों का कहना था कि सरकारी मेडिकल कॉलेजों से पोस्ट ग्रेजुएट कोर्स पूरा कर चुके हैं और अब उनका चयन सुपर स्पेशियलिटी कोर्स में हुआ है। आवेदकों का कहना था कि इस कोर्स के लिए सरकारी मेडिकल कॉलेजों द्वारा उनके मूल दस्तावेज नहीं लौटाए जा रहे हैं, जो अवैधानिक है। मामले में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता प्रतीक जैन और राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता जान्हवी पंडित ने पक्ष रखा। सुनवाई के बाद बेंच ने दस्तावेज लौटाने के सशर्त आदेश पारित किए।
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक अन्य मामले में कहा है कि रेलवे के प्रोजेक्ट के लिए दादा की जमीन के किए गए अधिग्रहण के बदले पोते को रोजगार नहीं दिया जा सकता। जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की डिवीजन बेंच ने कानून में सिर्फ जमीन मालिक, उसके पति या पत्नी और बेटे और बेटी को ही नौकरी देने का प्रावधान है। चूंकि कानून में पोते के लिए कोई प्रावधान नहीं है, इसलिए उसे नौकरी नहीं दी जा सकती। इन टिप्पणियों के साथ बेंच ने केन्द्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट) के उस फैसले को खारिज कर दिया, जिसमें पोते के दावे पर विचार करने कहा गया था।
हाईकोर्ट में यह आवेदन केन्द्र सरकार के रेल मंत्रालय, पमरे के सीनियर डिवीजनल ऑफिसर व अन्य की ओर से दाखिल किया गया था। आवेदकों का कहना था कि रीवा सीधी रेल परियोजना के लिए जगत प्रताप सिंह की जमीन अधिगृहीत की गई थी। इसके बदले जगत प्रताप सिंह को अप्रैल 2013 में चेक से भुगतान किया गया था। दिसंबर 2013 में रेलवे ने भूमि अधिग्रहण के प्रभावितों को नौकरी देने की अधिसूचना जारी की। जगत प्रताप सिंह के पोते भैया प्रशांत सिंह ने नौकरी के लिए आवेदन किया, जो खारिज कर दिया गया। इस पर भैया प्रशांत सिंह ने कैट में मामला दाखिल किया, जहां 21 मार्च 2025 को उसके मामले पर विचार करने के आदेश दिए गए। इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।
सुनवाई के दौरान केन्द्र सरकार और रेलवे की ओर से अधिवक्ता अर्णव तिवारी ने डिवीजन बेंच के सामने दलील दी कि रेलवे द्वारा जारी अधिसूचना में स्पष्ट था कि भूमि अधिग्रहण से प्रभावित होने वालों में सिर्फ जमीन मालिक, उसके पति या पत्नी या फिर बेटे और बेटी को ही नौकरी का प्रावधान था। पोते के लिए कोई प्रावधान नहीं था। ऐसे में अनावेदक भैया प्रशांत सिंह के मामले पर पुनर्विचार नहीं किया जा सकता। इतना ही नहीं, रेलवे द्वारा कट ऑफ डेट 1 जनवरी 2014 तय की गई थी और तब भैया प्रशांत सिंह नाबालिग था। पूरे मामले पर विचार करके बेंच ने पाया कि परिवार के पास पर्याप्त कृषि भूमि (लगभग 11.5 एकड़) पहले से मौजूद है, जिससे यह साबित होता है कि परिवार आजीविका से वंचित नहीं हुआ है। इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने कैट का फैसला खारिज कर दिया।