
जबलपुर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने नर्मदापुरम पुलिस की कार्यप्रणाली पर कड़ी टिप्पणी करते हुए राज्य के डीजीपी को मामले में दखल देने के निर्देश दिए हैं। नाबालिग से दुष्कर्म के केस में एसडीओपी द्वारा की गई पैरलल जांच पर कोर्ट ने गंभीर आपत्ति जताई है और इसे कानून के खिलाफ बताया है।
जस्टिस जीएस अहलूवालिया की बेंच ने सुनवाई के दौरान कहा कि जब किसी मामले की जांच पहले से चल रही हो तब समानांतर जांच कराना पूरी तरह अवैध है। कोर्ट ने साफ कहा कि ऐसी रिपोर्ट का ट्रायल में कोई वैधानिक महत्व नहीं होता और इसे नजरअंदाज किया जाना चाहिए।
मामले में एसडीओपी वीरेन्द्र कुमार मिश्रा ने 3 मार्च 2026 को एक रिपोर्ट दी थी जिसमें पीड़िता के आरोपों को सही नहीं माना गया। कोर्ट ने इस पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि रिपोर्ट में पीड़िता का बयान तक दर्ज नहीं किया गया और एकतरफा निष्कर्ष निकाल लिया गया।
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इटारसी के गोची तरौंदा निवासी आरोपी अर्पित चौरे ने जमानत के लिए इसी रिपोर्ट का हवाला दिया था। लेकिन कोर्ट ने जमानत देने से इनकार कर दिया और ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि एसडीओपी की रिपोर्ट पर किसी भी हालत में विचार न किया जाए।
मामला नर्मदापुरम जिले के पाथरोटा थाना क्षेत्र से जुड़ा है। आरोप है कि 27 फरवरी 2026 को आरोपी ने गांव की एक युवती के साथ जबरदस्ती की थी। इस केस में पुलिस की जांच पहले से चल रही थी लेकिन इसके बावजूद अलग से जांच कर रिपोर्ट तैयार कर दी गई जिस पर कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया।
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मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने अपने आदेश की प्रति राज्य के पुलिस प्रमुख को भेजने के निर्देश दिए हैं ताकि नर्मदापुरम पुलिस की कार्यप्रणाली की समीक्षा की जा सके। कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद पुलिस महकमे में भी हलचल मच गई है और आगे की कार्रवाई पर नजर बनी हुई है।