जबलपुर:संतोष वर्मा के खिलाफ दायर जनहित याचिका खारिज, हाईकोर्ट ने कहा-एनएसए लगाना प्रशासन का अधिकार

जबलपुर। हाईकोर्ट ने माना कि संबंधित मामले में एफआईआर पहले से दर्ज है, इसलिए इस संबंध में अलग आदेश की आवश्यकता नहीं है। एनएसए लगाने और विभागीय कार्रवाई जैसे मुद्दों को प्रशासनिक और वैधानिक प्रक्रिया का विषय बताया गया। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी विशेष समुदाय के लिए नीति बनाना न्यायपालिका का नहीं, बल्कि सरकार का अधिकार क्षेत्र है।
पहले से दर्ज है एफआईआर,अलग आदेश की जरूरत नहीं
जबलपुर निवासी अधिवक्ता अभिषेक दुबे ने जनहित याचिका दायर करते हुए आरोप लगाया था कि संतोष वर्मा ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में ब्राह्मण समाज को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। याचिका में उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग भी की गई थी। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में पहले ही एफआईआर दर्ज हो चुकी है। ऐसे में इस संबंध में अलग से कोई न्यायिक निर्देश देने की आवश्यकता नहीं बनती।
'अदालत सरकार को NSA लगाने के लिए बाध्य नहीं कर सकती'
याचिकाकर्ता ने संतोष वर्मा के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एनएसए) के तहत कार्रवाई की मांग भी की थी। इस पर अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति पर एनएसए लागू करना पूरी तरह प्रशासनिक निर्णय है। न्यायालय सरकार या प्रशासन को इस तरह का आदेश देने के लिए बाध्य नहीं कर सकता। इसलिए इस मांग को स्वीकार करने से इनकार कर दिया गया।
विभागीय कार्रवाई पर भी नहीं मिला निर्देश
याचिका में आईएएस अधिकारी के विरुद्ध विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई की मांग भी शामिल थी। हाईकोर्ट ने कहा कि अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों से जुड़े मामलों में भारत सरकार आवश्यक पक्ष होती है। चूंकि इस मामले में केंद्र सरकार को पक्षकार नहीं बनाया गया, इसलिए विभागीय कार्रवाई को लेकर कोई निर्देश जारी करना संभव नहीं है।
नीति निर्माण न्यायपालिका का नहीं, सरकार का विषय
ब्राह्मण समाज के हित में समयबद्ध दिशा-निर्देश और विशेष नीति बनाने की मांग पर भी अदालत ने असहमति जताई। कोर्ट ने कहा कि किसी विशेष समुदाय के लिए योजनाएं या नीतियां तैयार करना कार्यपालिका और विधायिका का अधिकार क्षेत्र है। न्यायपालिका इस प्रकार के नीतिगत मामलों में हस्तक्षेप नहीं कर सकती।
डिवीजन बेंच ने याचिका को किया खारिज
एक्टिंग चीफ जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस विजय कुमार शुक्ला की डिवीजन बेंच ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद जनहित याचिका खारिज कर दी। अदालत ने दोहराया कि जहां कानूनी प्रक्रिया पहले से जारी है, वहां कानून अपने निर्धारित तरीके से कार्य करेगा। इस आदेश के साथ मामले में मांगी गई सभी प्रमुख राहतों को न्यायालय ने अस्वीकार कर दिया।












