भोपाल में मध्यप्रदेश विधानसभा सत्र के दौरान कुपोषण का मुद्दा एक बार फिर केंद्र में रहा। विधायक अजय सिंह ने प्रदेश में बच्चों की पोषण स्थिति और आंगनवाड़ी स्तर पर मिलने वाले आहार बजट को लेकर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने संकेत दिया कि बढ़ती महंगाई के बीच मौजूदा पोषण सहायता राशि पर्याप्त नहीं रह गई है और इससे बच्चों के स्वास्थ्य पर सीधा असर पड़ सकता है।
इन सवालों के जवाब में महिला एवं बाल विकास मंत्री निर्मला भूरिया ने लिखित रूप से स्पष्ट किया कि राज्य सरकार कुपोषण को कम करने के लिए लगातार प्रयास कर रही है। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि फिलहाल पोषण आहार की राशि बढ़ाने का कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है। इस बयान के बाद सदन के भीतर और बाहर राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज हो गई है।
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सरकारी दावों के अनुसार, प्रदेश में कुपोषण के विभिन्न संकेतकों में कुछ सुधार दर्ज किया गया है। गंभीर कुपोषण (SAM), कम वजन और ठिगनेपन की दरों में गिरावट आई है। इसके बावजूद विशेषज्ञ मानते हैं कि सुधार की गति अपेक्षाकृत धीमी है और जमीनी स्तर पर अभी भी बड़ी चुनौतियां मौजूद हैं।
विधानसभा में प्रस्तुत आंकड़ों के मुताबिक, करीब 33% बच्चे कम वजन के हैं और लगभग 36% बच्चे ठिगनेपन (stunting) से प्रभावित हैं। ये आंकड़े दर्शाते हैं कि समस्या अभी भी व्यापक स्तर पर बनी हुई है।
अगस्त 2025 में प्रकाशित एक राष्ट्रीय रिपोर्ट के अनुसार, मध्यप्रदेश में लगभग 1.36 लाख बच्चे कुपोषित हैं, जिनमें से करीब 29 हजार बच्चे गंभीर कुपोषण (SAM) की श्रेणी में आते हैं। वहीं जुलाई 2025 की एक अन्य रिपोर्ट में बताया गया कि राज्य के लगभग 66 लाख बच्चों में से करीब 10 लाख बच्चे कुपोषण से प्रभावित हैं।
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इन आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि योजनाओं के बावजूद कुपोषण की समस्या बड़े पैमाने पर बनी हुई है और इसे नियंत्रित करने के लिए और प्रभावी कदमों की आवश्यकता है।
प्रदेश के आदिवासी और दूरस्थ जिलों में स्थिति और भी चिंताजनक है। अगस्त 2025 की एक क्षेत्रीय रिपोर्ट के अनुसार, धार, खरगोन और बड़वानी जैसे जिलों में 36% से 42% तक बच्चे कम वजन के पाए गए। यह दर्शाता है कि सामाजिक और भौगोलिक असमानताएं कुपोषण को और गहरा बना रही हैं।
राष्ट्रीय स्तर पर भी कुपोषण की स्थिति चिंता का विषय बनी हुई है। सितंबर 2025 में संसद में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, देश में करीब 34% बच्चे ठिगने और 15% बच्चे कम वजन के हैं। 2021 के NFHS-5 सर्वे में भी इसी तरह के रुझान सामने आए थे, जो बताते हैं कि यह समस्या लंबे समय से बनी हुई है।
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दिसंबर 2025 में केंद्र सरकार की ओर से जारी एक आधिकारिक बयान में पोषण अभियान और आंगनवाड़ी सेवाओं के जरिए सुधार का दावा किया गया। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि जमीनी स्तर पर इन योजनाओं का प्रभाव अपेक्षित गति से नहीं दिख रहा है।
वर्तमान बहस का मुख्य बिंदु पोषण आहार की राशि है। महंगाई के इस दौर में जब खाद्य सामग्री और पोषण से जुड़ी लागत लगातार बढ़ रही है, तब आहार राशि में वृद्धि न होना चिंता का विषय बन गया है। इससे आंगनवाड़ी स्तर पर बच्चों को मिलने वाले पोषण की गुणवत्ता प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है।