नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर अब आम लोगों की रसोई और जेब तक पहुंचने लगा है। कच्चे तेल और अन्य जरूरी कच्चे माल की कीमतों में तेज उछाल के चलते कंपनियां अब अपने उत्पादों के दाम बढ़ाने की तैयारी में हैं। इसका सीधा असर रोजमर्रा की जरूरतों- जैसे दूध, तेल, नमक, पैकेज्ड फूड, पानी से लेकर एसी, फ्रिज और मेडिकल सामान तक पड़ सकता है। स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि प्लास्टिक उद्योग, जो कई सेक्टर की रीढ़ माना जाता है, भारी संकट में है। उत्पादन लागत बढ़ने और एलपीजी की कमी के कारण हजारों छोटे-बड़े यूनिट्स बंद हो चुके हैं या बंद होने की कगार पर हैं। आने वाले दिनों में यह संकट महंगाई, बेरोजगारी और सप्लाई चेन पर बड़ा असर डाल सकता है।
पिछले एक महीने में कच्चे माल की कीमतों में जबरदस्त बढ़ोतरी दर्ज की गई है। प्लास्टिक उद्योग में इस्तेमाल होने वाला एलडीपीई (LDPE) जो पहले करीब 110 रुपये प्रति किलो था, अब 180 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गया है। इसके अलावा अन्य पॉलीमर और रॉ मटेरियल की कीमतों में भी 30,000 से 70,000 रुपये प्रति टन तक की वृद्धि देखी गई है। इसका सीधा असर उत्पादन लागत पर पड़ा है और कंपनियां अब इस बढ़ी हुई लागत को ग्राहकों पर डालने की तैयारी में हैं।
महंगाई का असर केवल उद्योग तक सीमित नहीं रहेगा। आम आदमी की जिंदगी में इस्तेमाल होने वाले कई जरूरी सामानों जैसें- बोतलबंद पानी, खाने का तेल और नमक, पैकेज्ड फुड, प्लास्टिक कंटेनर और टंकी, एसी और फ्रिज जैस इलेक्ट्रॉनिक सामान, नॉन-सर्जिकल मेडिकल प्रोडक्टस के दाम बढ़ सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अप्रैल महीने में प्लास्टिक उत्पादों की कीमतों में 50-60% तक बढ़ोतरी हो सकती है।
कॉमर्शियल एलपीजी की कमी ने हालात और बिगाड़ दिए हैं। प्लास्टिक उद्योग में गैस का इस्तेमाल जरूरी होता है, लेकिन इसकी सप्लाई बाधित होने से उत्पादन पर सीधा असर पड़ा है। देशभर में करीब 50 हजार प्लास्टिक यूनिट्स प्रभावित हुई हैं, जिनमें से लगभग 20 हजार छोटे उद्योग बंद हो चुके हैं। गुजरात के राजकोट, मध्य प्रदेश, रायपुर और हैदराबाद जैसे शहरों में कई फैक्ट्रियां या तो बंद हो गई हैं या उत्पादन घटा दिया गया है।
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प्लास्टिक उद्योग से सीधे तौर पर करीब 5 लाख लोग जुड़े हुए हैं। मौजूदा संकट अगर लंबा चला, तो इनमें से 2 से 3 लाख लोगों की नौकरी पर खतरा मंडरा सकता है। उद्योग से जुड़े संगठनों ने सरकार से मांग की है कि इस संकट के दौरान जीएसटी दर को कम किया जाए और बैंकों से वर्किंग कैपिटल लिमिट बढ़ाई जाए, ताकि उद्योग को राहत मिल सके।
एलपीजी की कमी और घरेलू सहायकों के लौटने के कारण शहरी इलाकों में लोगों का खाना पकाने का तरीका बदल रहा है। अब लोग रेडी-टू-ईट और इंस्टेंट फूड की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं। क्विक कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स पर ऐसे प्रोडक्ट्स की मांग में जबरदस्त बढ़ोतरी देखी गई है।
यह बदलाव दर्शाता है कि लोग अब समय और गैस दोनों बचाने वाले विकल्पों को प्राथमिकता दे रहे हैं।
इस संकट का असर निर्माण क्षेत्र पर भी पड़ रहा है। पेटकोक, कोयला और पैकेजिंग मटेरियल की कीमतें बढ़ने से सीमेंट उत्पादन महंगा हो गया है। विशेषज्ञों के अनुसार, लागत में 150-200 रुपये प्रति टन तक की बढ़ोतरी हो सकती है। हालांकि कंपनियों ने कीमतें बढ़ाने की कोशिश की, लेकिन बाजार में मांग कमजोर होने के कारण उन्हें यह फैसला वापस लेना पड़ा। फिलहाल कुछ क्षेत्रों में ही हल्की बढ़ोतरी टिक पाई है।