इलाहाबाद हाई कोर्ट ने हाल ही में शादीशुदा पुरुष और एक बालिग महिला के बीच लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि अगर दोनों वयस्क सहमति से साथ रह रहे हैं, तो यह कानूनी तौर पर अपराध नहीं है। इस फैसले ने कानून और समाज की नैतिकता के बीच चल रही बहस को फिर से उभारा है।
फैसले से यह साफ हो गया कि कानून और नैतिकता हमेशा एक जैसी नहीं होती। अदालत ने कहा कि किसी चीज को समाज गलत मानता है, इसका मतलब यह नहीं कि वह कानूनी अपराध है। केवल नैतिक आधार पर किसी पर कार्रवाई नहीं की जा सकती।
ये भी पढ़ें: धर्म बदलते ही खत्म हो जाएगा अनुसूचित जाति का दर्जा : सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, नहीं मिलेगा SC/ST एक्ट का लाभ
इस फैसले के बाद सोशल मीडिया पर बहस तेज हो गई है। खासकर शादीशुदा महिलाओं में चिंता बढ़ी है। उनका सवाल है कि अगर पति कानून के हिसाब से सुरक्षित हैं, तो वैवाहिक जीवन पर इसका क्या असर होगा।
कानूनी विशेषज्ञ बताते हैं कि यह अपराध नहीं है, लेकिन पत्नी चाहें तो इसी आधार पर पति से तलाक ले सकती हैं।
रिपोट्स के मुताबिक 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने आईपीसी की धारा 497 (एडल्टरी या व्यभिचार) को गैर-संवैधानिक करार दिया। इसका मतलब यह है कि विवाहेतर संबंध के कारण अब कोई फौजदारी मुकदमा नहीं चलेगा।
अगर शादीशुदा जीवन में किसी भी पक्ष ने विवाह के बाहर संबंध बनाए हैं, तो दूसरा पक्ष अदालत में तलाक के लिए जा सकता है। अदालत इस मामले में दोनों पक्षों की सुरक्षा और अधिकारों का ध्यान रखती है।
ये भी पढ़ें: Delhi High Court : UAE में गिरफ्तारी मामले में हाई कोर्ट में सुनवाई हुई, फैसले पर सेलिना जेटली ने जाहिर की खुशी
इस फैसले ने समाज में नई बहस शुरू कर दी है। एक तरफ कानून ने दो वयस्कों की सहमति और स्वतंत्रता को महत्व दिया है, वहीं पारंपरिक विचारधारा और वैवाहिक जीवन के समर्थक इस फैसले पर सवाल उठा रहे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला दिखाता है कि समाज और कानून के बीच संतुलन बनाना अब और मुश्किल हो गया है। अदालत ने कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा राज्य की जिम्मेदारी है, और कानून के तहत किसी को तब तक अपराधी नहीं माना जा सकता जब तक उसका काम संविधान या कानून का उल्लंघन न करे।