Naresh Bhagoria
29 Jan 2026
Shivani Gupta
29 Jan 2026
Naresh Bhagoria
29 Jan 2026
नरेश भगोरिया, भोपाल। खंडवा के भगवंतराव मंडलोई को दो बार मप्र के मुख्यमंत्री के रूप में काम करने का अवसर मिला, लेकिन कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति के कारण वे कम समय के लिए ही इस पद पर रह सके। दरअसल, राष्ट्रीय राजनीति से मप्र आए नेता कैलाशनाथ काटजू की वजह से मंडलोई मुख्यमंत्री बने भी और हटना भी उन्हीं की वजह से पड़ा।
दिल्ली से मप्र भेजे गए डॉ. कैलाशनाथ काटजू पं. जवाहरलाल नेहरू की पसंद थे। 31 जनवरी 1957 को काटजू ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। उस वक्त उन्हें भोपाल में बहुत कम लोग ही जानते थे। पांच साल बाद विधानसभा चुनाव हुआ तो काटजू रतलाम के जावरा सीट से चुनाव लड़े। इस चुनाव में कांग्रेस तो सत्ता में लौटी लेकिन काटजू चुनाव हार गए। उन्हें जनसंघ के लक्ष्मीनारायण पांडे ने हराया। जब कांग्रेस के मुख्यमंत्री उम्मीदवार काटजू चुनाव हार गए तो पार्टी के सामने सीएम चुनने का संकट था। ऐसे में भगवंतराव मंडलोई को मुख्यमंत्री चुना गया। 12 मार्च 1962 को उन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।
काटजू की हार नेहरू पचा नहीं पा रहे थे और फिर उन्हें मुख्यमंत्री बनाने की कोशिश होने लगी। काटजू के लिए नरसिंहगढ़ के राजा भानुप्रकाश सिंह ने अपनी सीट खाली की। भानुप्रकाश लोकसभा और विधानसभा दोनों के लिए चुने गए थे। तब उपचुनाव में डॉ. काटजू की जीत हुई और फिर उन्हें मुख्यमंत्री बनाने की बात चल पड़ी थी। हालांकि यह काटजू का दुर्भाग्य ही रहा कि वे मुख्यमंत्री नहीं बन पाए। कांग्रेस की आंतरिक राजनीति के चलते मंडलोई ने 29 सितंबर 1963 को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। हाईकमान द्वारा उनकी जगह द्वारका प्रसाद मिश्र को मुख्यमंत्री बना दिया गया। हालांकि राष्ट्रीय राजनीति में कामराज प्लान के तहत मुख्यमंत्रियों और केंद्रीय मंत्रियों से इस्तीफा मांगकर संगठन में काम करने को भी कहा गया था।
इससे पहले मप्र के पहले मुख्यमंत्री पं. रविशंकर शुक्ल के निधन पर भी भगवंतराव मंडलोई को मप्र का कार्यवाहक मुख्यमंत्री बनाया गया था। 31 जनवरी 1956 को मुख्यमंत्री रविशंकर शुक्ल के निधन के बाद मंडलोई ने 9 जनवरी 1957 से 30 जनवरी 1957 तक मध्य प्रदेश के कार्यवाहक मुख्यमंत्री के रूप नेतृत्व किया था। इनके मुख्यमंत्री बनने पर तख्तमल जैन ने काफी विरोध किया था। वे हमेशा मंडलोई का विरोध करते रहे। 21 दिन की कार्यवाहक सरकार चलाने के बाद कांग्रेस हाईकमान के आदेश पर उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और उनकी जगह कैलाशनाथ काटजू को मुख्यमंत्री बना दिया गया।
भगवंतराव मंडलोइ एक स्वतंत्रता सेनानी भी थे। वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के राजनेता थे, जो मध्य प्रांत (सीपी) और बरार राज्य से भारतीय संविधान सभा के लिए चुने गए थे। उनका जन्म 15 दिसंबर 1892 को मध्य प्रदेश के खंडवा में हुआ था। उनके पिता का नाम पं.अन्नाभाऊ मंडलोई और उनकी माता का नाम नत्थूबाई मंडलोई था। उन्होंने मैट्रिक की शिक्षा सागर, बीए की पढ़ाई जबलपुर और इलाहबाद से एलएलबी शिक्षा प्राप्त की। वे 1922 से 1925 तक नगर पालिका के सदस्य, फिर उपाध्यक्ष रहे। स्वतंत्रा आंदोलन में जेल में रहते हुए उन्होंने 1944 का नगर पालिका अध्यक्ष चुनाव जीता।
गांधीजी से प्रभावित होकर उन्होंने वकालत छोड़ दी, 1939 में व्यक्तिगत सत्याग्रह और 1942 में उन्हें भारत छोड़ो आंदोलन में भाषण देते हुए घंटाघर चौक से ही गिरफ्तार कर लिया गया था। वे 1952, 1957, 1962 के मध्य प्रदेश विधानसभा चुनावों में वह कांग्रेस के विधायक चुने गए। पहली बार विधायक चुनने के पश्चात वह मध्य प्रदेश की रविशंकर शुक्ल सरकार में मंत्री बनाए गए थे। 1970 में राष्ट्रपति ने उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया। 3 नवंबर 1977 को उनका निधन हो गया।
भगवंतराव मंडलोई के बड़े बेटे रामकृष्ण राव मंडलोई जिला परिषद के अध्यक्ष रहे. उनके दूसरे बेटे लक्ष्मण राव मंडलोई पार्षद और एल्डरमैन बने। तीसरे बेटे रघुनाथ राव मंडलोई जनपद अध्यक्ष, मंडी अध्यक्ष और विधायक बने। उनके परिवार से नंदा मंडलोई 1985 से 1990 तक खंडवा से विधायक रहीं।