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‘जादू की झप्पी’ का खतरनाक ट्रेंड: हग ड्रग के नशे में डूब रहे युवा, कुछ घंटों की खुशी बना रही मानसिक रोगी

शहर में पार्टियों और रेव कल्चर के बीच एक खतरनाक ट्रेंड तेजी से बढ़ रहा है, जिसे युवा ‘जादू की झप्पी’ या ‘हग ड्रग’ के नाम से जानते हैं।
‘जादू की झप्पी’ का खतरनाक ट्रेंड: हग ड्रग के नशे में डूब रहे युवा, कुछ घंटों की खुशी बना रही मानसिक रोगी

प्रवीण श्रीवास्तव, भोपाल। शहर में पार्टियों और रेव कल्चर के बीच एक खतरनाक ट्रेंड तेजी से बढ़ रहा है, जिसे युवा ‘जादू की झप्पी’ या ‘हग ड्रग’ के नाम से जानते हैं। यह ट्रेंड असल में MDMA (मिथाइलेनेडियोक्सीमेथैम्फेटामाइन) जैसे सिंथेटिक ड्रग से जुड़ा है जो कुछ घंटों के लिए अत्यधिक खुशी और भावनात्मक जुड़ाव का एहसास कराता है लेकिन इसके बाद मानसिक और शारीरिक समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं।

पार्टी की मस्ती बनी परेशानी

शहर के एक इंजीनियरिंग छात्र रूपेश (परिवर्तित नाम) का अनुभव इस खतरे को साफ दिखाता है। उसने बताया कि पार्टी में एक कैप्सूल लेने के बाद उसे वहां मौजूद लोगों के प्रति गहरा अपनापन महसूस हुआ और वह अपने साथी के साथ लंबे समय तक गले लगा रहा। उस समय उसे लगा कि उसकी सारी टेंशन खत्म हो गई है, लेकिन अगले ही दिन उसकी हार्ट बीट अचानक तेज हो गई और घबराहट इतनी बढ़ गई कि उसे हार्ट अटैक जैसा महसूस होने लगा। डॉक्टर से जांच कराने पर उसे मनोचिकित्सक के पास भेजा गया।

क्या है ‘हग ड्रग’ और कैसे करता है असर

विशेषज्ञों के मुताबिक MDMA जिसे एक्स्टसी या मौली भी कहा जाता है एक सिंथेटिक ड्रग है। यह मस्तिष्क में सेरोटोनिन, डोपामिन और ऑक्सीटोसिन जैसे केमिकल्स को असामान्य रूप से बढ़ा देता है। इससे व्यक्ति को अचानक अत्यधिक खुशी, ऊर्जा और दूसरों के प्रति भावनात्मक जुड़ाव महसूस होता है जिससे लोगों को गले लगाने की इच्छा बढ़ जाती है।

कुछ घंटों की खुशी, फिर ‘ब्रेन क्रैश’

गांधी मेडिकल कॉलेज की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. रुचि सोनी के अनुसार, ड्रग के असर में व्यक्ति दो से चार घंटे तक ‘फील गुड’ स्थिति में रहता है। लेकिन जैसे ही इसका असर खत्म होता है मस्तिष्क में सेरोटोनिन का स्तर तेजी से गिरता है जिसे ‘क्रैश’ कहा जाता है। इस दौरान व्यक्ति को खालीपन, बेचैनी, चिड़चिड़ापन और कई बार गहरे अवसाद का सामना करना पड़ता है।

तेजी से बढ़ रहे हैं मामले

डॉक्टरों के अनुसार पहले ऐसे मामले साल में कभी-कभार सामने आते थे, लेकिन अब हर महीने दो से तीन केस ओपीडी में पहुंच रहे हैं। खासकर 19 से 21 साल के युवाओं में इसका चलन तेजी से बढ़ा है। रेव और नाइट पार्टियों में इसे ‘लव ड्रग’ या ‘हग ड्रग’ के रूप में पेश किया जा रहा है।

विशेषज्ञों की चेतावनी

वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. सत्यकांत त्रिवेदी का कहना है कि आज की पीढ़ी में अकेलापन, परफॉर्मेंस प्रेशर और तुरंत खुशी पाने की चाह बढ़ी है। ऐसे में यह ड्रग एक आसान रास्ता लगता है लेकिन यही शॉर्टकट धीरे-धीरे डिपेंडेंसी और मानसिक असंतुलन की ओर ले जाता है।

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समय रहते समझना जरूरी

विशेषज्ञों का कहना है कि कुछ घंटों की कृत्रिम खुशी के बदले यह ड्रग युवाओं को मानसिक रोगों की ओर धकेल रहा है। ऐसे में जागरूकता और सही जानकारी ही इस खतरनाक ट्रेंड को रोकने का सबसे बड़ा तरीका है।

Sumit  Shrivastava
By Sumit Shrivastava

सुमित श्रीवास्तव एक अनुभवी मीडिया प्रोफेशनल, बिजनेस पत्रकार और शोधकर्ता हैं। मास कम्युनिकेशन में M.P...Read More

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