जब लाखनवाड़ी के जंगल में गूंजी आजादी की आवाज, चांदी के हंसिये से टूटा अंग्रेजों का कानून
छिंदवाड़ा। आजादी की लड़ाई में छिंदवाड़ा का लाखनवाड़ी जंगल सत्याग्रह साहस और अहिंसा की मिसाल माना जाता है। साल 1930 में महात्मा गांधी के आंदोलन से प्रभावित होकर जिले के कई गांवों में अंग्रेजी शासन के खिलाफ जागरूकता बढ़ रही थी। रामाकोना और खुटांबा क्षेत्र में बड़ी संख्या में लोग जंगल कानून का विरोध करने के लिए आगे आए। 21 अगस्त को सत्याग्रहियों ने लाखनवाड़ी जंगल पहुंचकर अंग्रेजों के वन कानून को चुनौती दी। इस आंदोलन में स्थानीय युवाओं के साथ आदिवासी समाज की भी बड़ी भूमिका रही। ब्रिटिश सरकार ने आंदोलन को रोकने के लिए गिरफ्तारियां और कठोर सजाएं दीं।
गांधी के आंदोलन से छिंदवाड़ा में बढ़ी जागरूकता
1920 के नागपुर कांग्रेस अधिवेशन और इसके बाद हुए आंदोलनों का असर महाकौशल क्षेत्र में भी दिखाई देने लगा था। 1923 के जबलपुर झंडा सत्याग्रह और 1930 के नमक सत्याग्रह ने छिंदवाड़ा के लोगों में आजादी की भावना मजबूत की। इसी माहौल में जंगल कानून के खिलाफ आंदोलन ने भी जोर पकड़ा।
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लाखनवाड़ी में सत्याग्रहियों ने तोड़ा वन कानून
अगस्त 1930 में रामाकोना और खुटांबा इस आंदोलन के प्रमुख केंद्र बने। रामाकोना से करीब छह किलोमीटर दूर नवथल गांव के लाखनवाड़ी इलाके में सत्याग्रहियों ने जंगल कानून का विरोध किया। 20 अगस्त की शाम लोगों ने आजादी के नारे लगाए। अगले दिन सत्याग्रहियों की टोली जंगल की ओर बढ़ी। विश्वनाथ दामोदर साल्पेकर के नेतृत्व में चांदी के हंसिये से घास काटकर अंग्रेजों के वन कानून का शांतिपूर्ण विरोध किया गया।
11-11 लोगों की टोलियों में हुई तैयारी
आंदोलन को व्यवस्थित तरीके से आगे बढ़ाने के लिए सत्याग्रहियों को छोटी-छोटी टोलियों में बांटा गया था। रामाकोना के तिवारी भवन में जगन्नाथ तिवारी ने प्रशिक्षण के लिए जगह उपलब्ध कराई। माणिकराव चौरे और भोपे परिवार ने सत्याग्रहियों के भोजन की व्यवस्था में सहयोग किया। इससे आंदोलन को स्थानीय स्तर पर मजबूत आधार मिला।
आदिवासी समाज ने भी निभाई बड़ी भूमिका
लाखनवाड़ी सत्याग्रह में बड़ी संख्या में आदिवासी लोगों ने हिस्सा लिया। 21 अगस्त को आदिवासी नेता बादल भोई भी आंदोलनकारियों के साथ मौजूद थे। ब्रिटिश सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर चांदा सेंट्रल जेल भेज दिया। जेल में उनके साथ कठोर व्यवहार किया गया। बाद में वर्ष 1940 में जेल में ही उनका निधन हो गया।
अंग्रेजों ने आंदोलनकारियों पर बरपाया दमन
सत्याग्रह से परेशान ब्रिटिश सरकार ने आंदोलनकारियों पर कार्रवाई शुरू कर दी। रघुनाथ भोपे को छह महीने की सजा सुनाई गई, जबकि प्रशिक्षण शिविर के लिए जगह देने वाले जगन्नाथ तिवारी पर जुर्माना लगाया गया। तीन नाबालिग सत्याग्रहियों को भी बेंतों की सजा दी गई। अंग्रेजी शासन की इस कार्रवाई ने आंदोलनकारियों के हौसले को नहीं तोड़ा।
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आज भी याद किया जाता है लाखनवाड़ी सत्याग्रह
लाखनवाड़ी का जंगल सत्याग्रह छिंदवाड़ा के स्वतंत्रता इतिहास में खास स्थान रखता है। वर्ष 1933 में महात्मा गांधी ने छिंदवाड़ा पहुंचकर जंगल सत्याग्रह से जुड़े आदिवासी कार्यकर्ताओं से मुलाकात की थी। इस आंदोलन ने आगे चलकर स्वतंत्रता संग्राम की गतिविधियों को मजबूती दी। लाखनवाड़ी आज भी उन लोगों के संघर्ष और बलिदान की याद दिलाता है, जिन्होंने अंग्रेजी शासन के खिलाफ आवाज उठाई।
EDIT BY: ADITI RAWAT























