Naresh Bhagoria
7 Jan 2026
चेन्नई। तमिलनाडु के मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच ने मंगलवार को तिरुप्परनकुंड्रम मंदिर परिसर की पहाड़ी पर स्थित दरगाह के पास बने दीपस्तंभ (दीपथून) पर दीप जलाने की इजाजद दे दी है। इस मामले की सुनवाई जस्टिस जी. जयचंद्रन और जस्टिस के.के. रामकृष्णन की डिवीजन बेंच ने इससे पहले आए जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन के सिंगल बेंच के फैसले को बरकरार रखा।
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि दीप जलाने के मुद्दे को बेवजह राजनीतिक रंग दिया गया, जबकि यह एक लंबे समय से चली आ रही धार्मिक परंपरा से जुड़ा मामला है। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि जिला प्रशासन को इसे कानून-व्यवस्था की समस्या मानने के बजाय विभिन्न समुदायों के बीच संवाद और समन्वय का अवसर समझना चाहिए था।
यह मामला हिंदू तमिल पार्टी के नेता राम रविकुमार की याचिका से जुड़ा है। याचिका में मांग की गई थी कि कार्तिगई दीपम पर्व के दौरान पहाड़ी पर बने पत्थर के पिलर पर पारंपरिक रूप से दीप जलाने की अनुमति दी जाए। इस पर सुनवाई करते हुए पिछले साल 1 दिसंबर को जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन ने याचिका स्वीकार कर दीपम जलाने का आदेश दिया था।
हालांकि, तमिलनाडु की स्टालिन सरकार ने कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका जताते हुए इस आदेश को लागू करने से इनकार कर दिया था। सरकार ने सिंगल बेंच के फैसले पर आपत्ति जताते हुए आरोप लगाया कि इससे सांप्रदायिक तनाव बढ़ सकता है। इसी के साथ राज्य सरकार ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती भी दी है।
फिलहाल, मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच के ताजा फैसले से दीप जलाने की परंपरा को कानूनी मान्यता मिल गई है, जिसे लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा था।
दरअसल तमिलनाडु के मदुरै से करीब 10 किलोमीटर दक्षिण में स्थित तिरुप्परनकुंड्रम शहर धार्मिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। यह भगवान मुरुगन के छह प्रमुख निवास स्थलों (आऱुपदई वीडु) में से एक है। यहां तिरुप्परनकुंड्रम पहाड़ी पर स्थित सुब्रमण्य स्वामी मंदिर छठी शताब्दी का बताया जाता है, जो प्राचीन तमिल संस्कृति और आस्था का प्रतीक है।
जहां इस पहाड़ी की सबसे ऊंची चोटी पर एक दीपस्तंभ (दीपथून) स्थापित है। मान्यता है कि ऐतिहासिक काल से ही तमिल महीने कार्तिगई की पूर्णिमा तिथि, जो आमतौर पर नवंबर-दिसंबर के बीच आती है, को कार्तिगई दीपम पर्व के अवसर पर इस दीपस्तंभ पर दीपक जलाने की परंपरा चली आ रही है। यह पर्व प्रकाश, आस्था और धार्मिक परंपरा से जुड़ा माना जाता है।
हालांकि, 17वीं शताब्दी में पहाड़ी पर सिकंदर बधूषा दरगाह के निर्माण के बाद इस परंपरा को लेकर विवाद शुरू हो गया। दरगाह और दीपस्तंभ के बीच की दूरी लगभग 15 मीटर बताई जाती है। दरगाह बनने के बाद से मंदिर प्रशासन और दरगाह प्रबंधन के बीच दीप जलाने के स्थान को लेकर मतभेद सामने आने लगे।
दरगाह प्रबंधन का कहना है कि लंबे समय से दीप जलाने की परंपरा मंदिर परिसर के पास स्थित उचि पिल्लैयार मंडपम के नजदीक रही है, न कि पहाड़ी की चोटी पर बने दीपस्तंभ पर। इसी दावे को लेकर समय-समय पर विवाद और प्रशासनिक हस्तक्षेप भी होता रहा है। यह मामला अब धार्मिक परंपरा, ऐतिहासिक मान्यताओं और सामाजिक समन्वय से जुड़ा एक संवेदनशील विषय बन चुका है, जिस पर अदालतों तक में सुनवाई हो रही है।