मध्य प्रदेश के जबलपुर शहर के मुस्लिम बहुल क्षेत्र में स्थित मां बूढ़ी खेरमाई मंदिर आस्था का एक प्राचीन केंद्र माना जाता है। यह मंदिर लगभग 1500 वर्ष पुराना बताया जाता है और अपनी ऐतिहासिकता तथा धार्मिक महत्व के कारण दूर-दूर तक प्रसिद्ध है।
यह स्थान अलग-अलग समुदायों के बीच सामंजस्य और सह-अस्तित्व का भी प्रतीक है, जहां सभी लोग मिलकर श्रद्धा के साथ पूजा-अर्चना करते हैं।
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मंदिर के प्रमुख पुजारी राघवेंद्र पांडेय के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण गोंड शासनकाल में हुआ था। समय के साथ यह स्थान सिर्फ एक पूजा स्थल नहीं रहा, बल्कि एक आध्यात्मिक शक्ति केंद्र के रूप में विकसित हुआ। यहां की परंपराएं और अनुष्ठान आज भी उसी प्राचीन शैली में किए जाते हैं, जो इसकी सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखते हैं।
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मंदिर में तांत्रिक साधना और विशेष धार्मिक अनुष्ठानों का विशेष महत्व है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि यहां की पूजा करने से जीवन की नकारात्मक ऊर्जा, नजर दोष और तांत्रिक बाधाएं दूर होती हैं।
इसी आस्था के कारण न केवल आसपास के जिले बल्कि दूर-दराज के लोग भी अपनी मनोकामनाएं लेकर यहां पहुंचते हैं। भक्तों का मानना है कि मां बूढ़ी खेरमाई की कृपा से उनकी मुरादें पूरी होती हैं।
यह मंदिर ऐसे क्षेत्र में स्थित है जहां विभिन्न समुदायों के लोग एक साथ रहते हैं। नवरात्रि जैसे पावन अवसरों पर यहां धार्मिक उत्सव के साथ-साथ सामाजिक एकता का अद्भुत दृश्य देखने को मिलता है। यह स्थान आस्था सीमाओं से परे है और समाज में आपसी भाईचारा ही सबसे बड़ी ताकत है।
श्रद्धालुओं की भीड़ और व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए मंदिर परिसर में पुलिस प्रशासन द्वारा 24 घंटे सुरक्षा व्यवस्था की गई है। 1-4 के अनुपात में गार्ड तैनात रहते हैं, जो हर गतिविधि पर नजर रखते हैं और सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं।
नवरात्रि के समापन पर यहां एक भव्य विसर्जन जुलूस निकाला जाता है। इस जुलूस में लगभग 1100 बानों (धार्मिक ध्वजों) के साथ श्रद्धालु शामिल होते हैं।
ढोल-नगाड़ों की गूंज और जयकारों के बीच निकलने वाला यह जुलूस हजारों लोगों की भागीदारी के साथ संपन्न होता है। यह आयोजन शहर की धार्मिक परंपरा और सांस्कृतिक धरोहर का जीवंत उदाहरण है।