ईरान-अमेरिका में टकराव तेज :मिडिल ईस्ट में बढ़ी सैन्य हलचल, USS Tripoli की एंट्री से बढ़ा खतरा

मिडिल ईस्ट में ईरान और अमेरिका के बीच तनाव अब खुले टकराव की ओर बढ़ता दिख रहा है। हालात तेजी से बदल रहे हैं और दोनों पक्षों की सैन्य गतिविधियां इस बात का संकेत दे रही हैं कि संघर्ष अब सीमित नहीं रहा। United States Central Command (CENTCOM) के अनुसार, क्षेत्र में अमेरिकी सैनिकों की संख्या 3500 के पार पहुंच चुकी है, जबकि आधुनिक युद्धपोत USS Tripoli अपने ऑपरेशन जोन में तैनात हो चुका है। इस जहाज पर करीब 2500 मरीन सैनिक मौजूद हैं, जो किसी भी स्थिति से निपटने के लिए तैयार हैं। इस बीच, 28 फरवरी से चल रहे ऑपरेशन “एपिक फ्यूरी” के तहत अमेरिका अब तक 11,000 से अधिक टारगेट पर हमला कर चुका है। इन घटनाओं ने पूरे क्षेत्र को युद्ध के कगार पर ला खड़ा किया है।
USS Tripoli की तैनाती: समुद्र से बढ़ता दबाव
अमेरिका की रणनीति में इस बार नौसैनिक ताकत अहम भूमिका निभा रही है। USS Tripoli जैसे अत्याधुनिक युद्धपोत की तैनाती इसका बड़ा संकेत है। यह जहाज F-35 Lightning II जैसे स्टील्थ फाइटर जेट और ओस्प्रे एयरक्राफ्ट ऑपरेट करने में सक्षम है। पहले इसे जापान में तैनात किया गया था, लेकिन अचानक इसे मिडिल ईस्ट भेजा जाना इस बात की ओर इशारा करता है कि अमेरिका अब किसी भी संभावित बड़े संघर्ष के लिए तैयारी कर रहा है। इसके साथ ही USS Boxer और अन्य नौसैनिक यूनिट्स भी धीरे-धीरे इस क्षेत्र में पहुंच रही हैं।
ऑपरेशन एपिक फ्यूरी: लगातार हमलों का सिलसिला
CENTCOM के मुताबिक, 28 फरवरी से शुरू हुआ “एपिक फ्यूरी” ऑपरेशन अब बड़े पैमाने पर चल रहा है। इस ऑपरेशन के तहत अमेरिका ने 11,000 से ज्यादा ठिकानों को निशाना बनाया है। इन हमलों में मुख्य रूप से ईरान समर्थित ठिकानों, हथियार भंडार और सैन्य संरचनाओं को टारगेट किया गया है। लगातार हो रही बमबारी ने क्षेत्र में अस्थिरता को और बढ़ा दिया है।
ईरान का पलटवार: एयरबेस पर हमला
तनाव तब और बढ़ गया जब ईरान ने सऊदी अरब स्थित प्रिंस सुल्तान एयर बेस पर बैलिस्टिक मिसाइल और ड्रोन से हमला किया। इस हमले में करीब 10 अमेरिकी सैनिक घायल हुए। यह हमला सीधे तौर पर अमेरिका को संदेश देने की कोशिश माना जा रहा है कि ईरान भी जवाबी कार्रवाई से पीछे नहीं हटेगा। इस घटना के बाद क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था और कड़ी कर दी गई है।
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हूती विद्रोहियों की एंट्री से जंग और जटिल
यमन के हूती विद्रोहियों ने भी इस संघर्ष में सक्रिय भूमिका निभानी शुरू कर दी है। उन्होंने इजरायल की ओर मिसाइल दागने का दावा किया है। इससे संघर्ष अब सिर्फ अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसमें क्षेत्रीय शक्तियां भी शामिल हो गई हैं। इससे युद्ध का दायरा और बढ़ गया है और हालात अधिक जटिल हो गए हैं।
समुद्री रास्तों पर संकट
इस संघर्ष का असर अब अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर भी साफ दिखने लगा है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और बाब-अल-मंडेब जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों की सुरक्षा खतरे में है। कई शिपिंग कंपनियों ने अपने रूट बदल दिए हैं, जिससे तेल और अन्य सामानों की सप्लाई प्रभावित हो रही है। स्वेज नहर के जरिए होने वाला व्यापार भी जोखिम में आ गया है।
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अमेरिका की रणनीति: बिना जमीनी युद्ध के लक्ष्य हासिल करना
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने स्पष्ट किया है कि अमेरिका फिलहाल जमीनी सैनिकों को उतारे बिना अपने लक्ष्य हासिल करना चाहता है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि बदलते हालात में डोनाल्ड ट्रंप को किसी भी विकल्प के लिए तैयार रहना होगा। इसका मतलब यह है कि यदि स्थिति बिगड़ती है, तो अमेरिका जमीनी कार्रवाई से भी पीछे नहीं हटेगा।
कूटनीतिक प्रयास नाकाम
तनाव को कम करने के लिए कूटनीतिक स्तर पर भी प्रयास किए गए, लेकिन अब तक कोई सफलता नहीं मिली है। अमेरिका की ओर से विशेष दूत स्टीव विटकॉफ ने सीजफायर का प्रस्ताव रखा था। इस प्रस्ताव में ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर रोक और समुद्री रास्तों को खोलने की बात शामिल थी। लेकिन ईरान ने इसे खारिज कर दिया और बदले में मुआवजे तथा अपनी संप्रभुता की मान्यता की मांग रखी। इस असहमति ने शांति की उम्मीदों को कमजोर कर दिया है।












