तेहरान। शनिवार की सुबह मिडिल ईस्ट के लिए एक बड़ा झटका लेकर आई। अमेरिका और इजराइल के संयुक्त हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत ने न केवल ईरान बल्कि पूरी दुनिया के शक्ति समीकरण को हिलाकर रख दिया। इसके बाद से सवाल उठ रहे हैं कि, अब ईरान में सत्ता की बागडोर किसके हाथ में जाएगी।
ईरान में सुप्रीम लीडर या ‘रहबर’ का पद राष्ट्रपति से भी ज्यादा ताकतवर माना जाता है। रहबर के पास देश की सरकार, सेना, विदेश नीति और समाज पर अंतिम नियंत्रण होता है। उनके फैसले राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दोनों स्तर पर निर्णायक होते हैं।
खबरों के अनुसार, अली खामेनेई ने बीमारी के दौरान अपने दूसरे बेटे मुजतबा खामेनेई को उत्तराधिकारी बनाने की तैयारी कर ली थी। 2024 में उनके द्वारा गोपनीय रूप से असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स को बुलाकर मुजतबा की तरफ झुकाव दिखाने के बाद अब उनके सार्वजनिक रूप से पद संभालने की संभावना बढ़ गई है।
मुजतबा हुसैनी खामेनेई का जन्म 8 सितंबर 1969 को ईरान के मशहद में हुआ था। वे अली खामेनेई के दूसरे बेटे हैं। उन्होंने धार्मिक शिक्षा ग्रहण की और मौलवी बने। इसके बाद उन्होंने कुम सेमिनरी में इस्लामिक धर्मशास्त्र पढ़ाया, जहां उन्होंने धार्मिक शिक्षक के रूप में अपनी अलग पहचान बनाई। उनका व्यक्तित्व काफी रहस्यमयी है और वे सार्वजनिक भाषण बहुत कम देते हैं।
मुजतबा खामेनेई ने 1987 में इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) में शामिल होकर ईरान-इराक युद्ध के दौरान सेवाएं दीं। इस दौरान उन्होंने सेना और सिक्योरिटी सिस्टम के अंदर मजबूत संपर्क बनाए। समय के साथ उनके संबंध सैन्य अधिकारियों के साथ-साथ धार्मिक और राजनीतिक नेताओं तक भी फैल गए। 2000 के दशक की शुरुआत तक उनका नेटवर्क काफी प्रभावशाली हो चुका था, जिसने उन्हें ईरान की सत्ता व्यवस्था के सबसे मजबूत और प्रभावशाली दावेदारों में शामिल कर दिया।
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मुजतबा खामेनेई की शादी जहरा हद्दाद-आदेल से हुई, जो ईरान के पूर्व संसद अध्यक्ष के परिवार से ताल्लुक रखती हैं। यह विवाह उनके राजनीतिक कनेक्शन को और मजबूत करता है। इस दंपति के तीन बच्चे हैं, जो भविष्य में भी ईरान की राजनीति से जुड़े रहने की संभावना रखते हैं।
मुजतबा खामेनेई ने कभी भी किसी सरकारी पद को संभाला नहीं, लेकिन उनकी राजनीतिक भागीदारी लगातार बढ़ती रही है। 2005 और 2009 के राष्ट्रपति चुनावों में उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद का समर्थन किया। 2009 में हुए विरोध प्रदर्शन, जिन्हें बाद में ग्रीन मूवमेंट कहा गया, को दबाने में उनकी अहम भूमिका रही। आलोचक उन पर सरकारी धन के दुरुपयोग और सत्ता के गलत इस्तेमाल का आरोप लगाते हैं। मुजतबा सार्वजनिक रूप से बहुत कम भाषण देते हैं, लेकिन कहा जाता है कि वे ईरान की खुफिया और सरकारी एजेंसियों में अपने समर्थकों के माध्यम से महत्वपूर्ण फैसलों पर प्रभाव डालते हैं।
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अली खामेनेई का जन्म 19 अप्रैल 1939, मशहद में हुआ। वे शाह के शासन के खिलाफ विरोध में सक्रिय हुए और 1979 की ईरानी क्रांति में प्रमुख चेहरा बने।
उनके शासनकाल में ईरान ने न्यूक्लियर प्रोग्राम, बैलिस्टिक मिसाइल प्रोजेक्ट और क्षेत्रीय प्रभाव को मजबूत किया। समर्थक उन्हें इस्लामी व्यवस्था का मजबूत रक्षक मानते हैं, जबकि आलोचक उन्हें कट्टर और सख्त शासन चलाने का आरोप देते हैं।
रहबर (Supreme Leader): सरकार, सेना, समाज और विदेश नीति पर अंतिम निर्णय।
असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स: 88 धर्मगुरु जो रहबर का चुनाव और निगरानी करते हैं।
राष्ट्रपति: सरकार चलाते हैं, लेकिन अंतिम निर्णय रहबर का होता है।
गार्डियन काउंसिल: 6 धर्मगुरु और 6 जज; संसद के कानून रोक सकते हैं।
संसद: 290 सदस्य; कानून बनाती है और राष्ट्रपति या मंत्रियों पर कार्रवाई कर सकती है।
अली खामेनेई की मौत अमेरिका और इजराइल के संयुक्त हमले में हुई, जिसका उद्देश्य अमेरिकी नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और संभावित खतरे को खत्म करना बताया गया। ईरानी मीडिया ने भी उनके निधन की पुष्टि की है। इस हमले के बाद सात देशों में अमेरिकी ठिकानों पर ईरानी मिसाइल हमले हुए और क्षेत्र में तनाव और बढ़ गया।
अगर मुजतबा सुप्रीम लीडर बनते हैं, तो उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा-
आंतरिक स्थिरता बनाए रखना: विरोधियों और धार्मिक आलोचकों के बीच संतुलन।
क्षेत्रीय शक्ति प्रबंधन: हिज्बुल्लाह और अन्य शिया गुटों के साथ तालमेल।
अंतरराष्ट्रीय दबाव: अमेरिका और इजराइल के साथ बढ़ते तनाव का प्रबंधन।
विरासत संभालना: पिता की धार्मिक और राजनीतिक धरोहर को बनाए रखना।
न्यूक्लियर प्रोग्राम: अमेरिका का शक कि ईरान हथियार विकसित कर सकता है।
बैलिस्टिक मिसाइल: ईरान इसे अपनी सुरक्षा के लिए आवश्यक मानता है।
इजराइल विरोध: ईरान इजराइल का खुलकर विरोध करता है।
मिडिल ईस्ट में प्रभाव: इराक, सीरिया, लेबनान और यमन में समर्थक गुटों को मदद।
आर्थिक पाबंदियां: अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण ईरान की अर्थव्यवस्था पर असर।