भारतीय मुद्रा बाजार में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया 69 पैसे टूटकर ₹92.18 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और ईरान से जुड़े घटनाक्रम के बीच वैश्विक बाजारों में अस्थिरता बढ़ी है जिसका सीधा असर रुपए पर दिखाई दे रहा है।
मिडिल ईस्ट में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के कारण निवेशकों ने सुरक्षित निवेश विकल्प के रूप में डॉलर को अधिक प्राथमिकता दी। जब वैश्विक अनिश्चितता बढ़ती है तो डॉलर की मांग में तेजी आती है। इसी वजह से उभरते बाजारों की मुद्राओं पर दबाव आता है और रुपए पर भी दबाव देखने को मिलता है।
आज रुपए की गिरावट के साथ घरेलू शेयर बाजारों में भी कमजोरी देखने को मिली है। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FII) ने जोखिम कम करने के लिए बिकवाली की है। डॉलर की मजबूती और ग्लोबल हालात को देखते हुए निवेशकों का रुख फिलहाल सतर्क बना हुआ है।
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ईरान से जुड़े तनाव के कारण कच्चे तेल की सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ी है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतों में उछाल देखा गया है। कच्चे तेल की कीमतें $85 प्रति बैरल के करीब पहुंच गई हैं। भारत ऑयल का बड़ा हिस्सा आयात करता है इसलिए तेल महंगा होने का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। तेल की कीमतें बढ़ने से आयात बिल बढ़ सकता है। इससे चालू खाता घाटा बढ़ेगा और महंगाई पर दबाव आएगा। रुपया कमजोर होने से आयात और महंगा हो जाता है, जिससे कंपनियों की लागत बढ़ सकती है।
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हालांकि कमजोर रुपया कुछ सेक्टर के लिए राहत भी लेकर आता है। IT, फार्मा और टेक्सटाइल जैसी कंपनियां, जिनकी कमाई डॉलर में होती है, उन्हें ज्यादा रुपए मिलते हैं। इससे उनके मार्जिन बेहतर हो सकते हैं।