MP Water Crisis:उद्गम पर ही दम तोड़ रहीं नर्मदा, शिप्रा और बेतवा; सूख रही सदानीरा नदियों की सांस

राजीव सोनी, भोपाल। नदियों के घर कहे जाने वाले मध्यप्रदेश में अब जल संकट की भयावह तस्वीर सामने आने लगी है। जंगलों की अंधाधुंध कटाई, अवैध खनन, अतिक्रमण और बढ़ते प्रदूषण ने प्रदेश की प्रमुख नदियों को उनके उद्गम स्थल पर ही कमजोर कर दिया है। हालत यह है कि नर्मदा, शिप्रा, बेतवा और सोन जैसी सदानीरा नदियां अब अपने स्रोत पर ही सूखने लगी हैं। प्रदेश में पहली बार ऐसी स्थिति बनी है जब अमरकंटक में नर्मदा की अविरल धारा टूट गई है और प्रसिद्ध कपिल धारा प्रपात सूखा दिखाई दे रहा है। वहीं बेतवा के उद्गम स्थल पर धूल उड़ रही है जबकि शिप्रा का अस्तित्व अब काफी हद तक नर्मदा के पानी पर टिका हुआ है।
अमरकंटक में सूखने लगी नर्मदा की धारा
मध्यप्रदेश की जीवनरेखा कही जाने वाली नर्मदा नदी के उद्गम स्थल अमरकंटक में स्थिति बेहद चिंताजनक हो गई है। सदियों से बारहमासी बहने वाला कपिल धारा प्रपात अब सूखा पड़ा है। नर्मदा कुंड का गोमुख भी सूख चुका है और वहां से पानी का बहाव बंद हो गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि अमरकंटक का पूरा ईकोसिस्टम तेजी से बिगड़ रहा है। जंगलों की कटाई, अनियंत्रित निर्माण और खनन के कारण भूजल स्तर प्रभावित हुआ है। नर्मदा प्रदेश के 16 जिलों में करीब 1077 किलोमीटर बहती है लेकिन अब इसके अस्तित्व पर भी खतरे के संकेत दिखाई देने लगे हैं।
शिप्रा में नर्मदा का पानी डालकर बचाया जा रहा प्रवाह
उज्जैन की धार्मिक पहचान मानी जाने वाली शिप्रा नदी भी गंभीर संकट से गुजर रही है। इंदौर जिले के कांकरी बड़ली स्थित शिप्रा के उद्गम स्थल का कुंड सूख चुका है। हालात इतने खराब हैं कि उज्जैनी मूंडला गांव के पास पाइपलाइन के जरिए नर्मदा का पानी छोड़कर शिप्रा में बहाव बनाए रखा जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अतिक्रमण और पर्यावरणीय अनदेखी ने शिप्रा के प्राकृतिक स्रोतों को कमजोर कर दिया है। यही स्थिति चंबल नदी के उद्गम क्षेत्र में भी दिखाई दे रही है।
बेतवा के उद्गम पर उड़ रही धूल
भोपाल से करीब 22 किलोमीटर दूर रायसेन जिले के झिरी गांव से निकलने वाली बेतवा नदी कभी बारहमासी मानी जाती थी। लेकिन अब इसके उद्गम स्थल पर पानी की जगह धूल उड़ रही है।

सरकार ने बेतवा रिवाइवल प्रोजेक्ट की घोषणा तो की लेकिन सवा साल गुजरने के बाद भी जमीनी काम शुरू नहीं हो सका। हालांकि कुछ सामाजिक संगठनों ने 140 चेक डैम बनाकर भूजल स्तर सुधारने की कोशिश जरूर की है।
जल संसाधन मंत्री ने जताया संकल्प
प्रदेश के जल संसाधन मंत्री तुलसी सिलावट ने नदियों के उद्गम स्थलों को बचाने का संकल्प तो जताया है लेकिन अब तक कोई बड़ा ठोस अभियान जमीन पर नजर नहीं आया है। वहीं पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री प्रहलाद पटेल ने इसे भविष्य का बड़ा जल संकट बताते हुए जन आंदोलन की जरूरत बताई है।
नदियों को माई कहकर कमाई का जरिया बनाया जा रहा
देश के प्रसिद्ध जल विशेषज्ञ और ‘जलपुरुष’ राजेंद्र सिंह ने कहा कि नदियों की हालत केवल मध्यप्रदेश ही नहीं, पूरे देश में खराब होती जा रही है। उन्होंने कहा कि नदियों को “माई” कहकर सिर्फ कमाई का साधन बनाया जा रहा है जबकि उनके संरक्षण के लिए ठोस नीति और मॉनिटरिंग की जरूरत है। उन्होंने चेतावनी दी कि उद्गम स्थलों की अनदेखी आने वाले समय में बड़े जल संकट का कारण बन सकती है।
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विशेषज्ञों ने जताई गंभीर चिंता
नर्मदा उद्गम स्थल अमरकंटक से जुड़े वंदे महाराज धनेश द्विवेदी ने कहा कि गोमुख का सूखना बेहद बड़ी त्रासदी है। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर अमरकंटक क्षेत्र में निर्माण, जंगल कटाई और खनन पर सख्ती नहीं हुई तो दुर्लभ वनस्पतियां और प्राकृतिक जल स्रोत खत्म हो सकते हैं। वहीं पूर्व प्रिंसिपल चीफ कमिश्नर आरके पालीवाल ने कहा कि केवल चेक डैम बनाना काफी नहीं होगा। जंगल कटाई, अवैध खनन और अतिक्रमण पर सख्ती जरूरी है।
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बढ़ता संकट दे रहा बड़ा संकेत
नर्मदा, शिप्रा और बेतवा जैसी नदियों का उद्गम स्थल पर ही कमजोर होना केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं बल्कि आने वाले बड़े जल संकट का संकेत माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर अभी संरक्षण और पुनर्जीवन के ठोस कदम नहीं उठाए गए तो भविष्य में प्रदेश को गंभीर जल संकट का सामना करना पड़ सकता है।












