दुनिया की सबसे अनोखी रंगयात्रा!हाईटेक मशीनों-मिसाइल से उड़ेगा गुलाल, यूनेस्को मान्यता की तैयारी तेज

इंदौर में आज रंगपंचमी का भव्य महोत्सव मनाया जा रहा है। प्रशासन इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने और यूनेस्को की सूची में शामिल कराने के लिए पूरी तैयारी कर चुका है। कलेक्टर शिवम वर्मा ने बताया कि इस बार गेर में नियमों को कड़ा रखा गया है। चेहरे पर मास्क पहनने वाले और सीटी या विसल बजाने वालों पर प्रतिबंध है। डीजे और साउंड सिस्टम को तय सीमा में रखा गया है। महिलाओं की सुरक्षा के लिए विशेष महिला टास्क फोर्स तैनात की गई है। लगभग 4000 पुलिसकर्मी गेर की सुरक्षा और व्यवस्था संभालेंगे। पूरे आयोजन की निगरानी CCTV कैमरों से की जा रही है। कलेक्टर ने स्पष्ट कहा, उत्पात करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी।

तीन पीढ़ियों की परंपरा- गिरी परिवार का योगदान
इंदौर की गेर को जीवित रखने और बढ़ाने में गिरी परिवार का महत्वपूर्ण योगदान है। शेखर गिरी बताते हैं कि उनके दादा बाबूलाल गिरी ने इसे संगठित रूप से शुरू किया था। अब शेखर और उनके परिवार की तीसरी पीढ़ी इसे आयोजित कर रही है। उनका कहना है, गेर सिर्फ उत्सव नहीं, यह इंदौर की पहचान और आस्था है।
इंदौर की गेर क्यों खास है?
- एशिया की सबसे बड़ी रंग यात्रा
- 76 से अधिक वर्षों का इतिहास
- लाखों लोगों की भागीदारी
- हाईटेक गुलाल मशीनों का उपयोग
- परंपरा और आधुनिकता का अनूठा मिश्रण
गेर का भव्य आयोजन
इस बार रंगपंचमी पर आठ मार्च को टोरी कार्नर, मारल क्लब, संगम कार्नर, रसिया कार्नर और हिंद रक्षक की फाग यात्रा राजवाड़ा क्षेत्र से होकर गुजरेंगी। सुबह 10 बजे से दोपहर 3 बजे तक हजारों लोग उत्सव में शामिल होंगे।

- संगम कार्नर: 8 हजार किलो टेसू के फूल से 2500 किलो रंग‑गुलाल तैयार होगा। राजवाड़ा पर लट्ठमार होली और राधा‑कृष्ण का रास दिखाया जाएगा। मिसाइलों से तिरंगा बनेगा।
- रसिया कार्नर: 53वां वर्ष, लव जिहाद पर जनजागरण का संदेश। 40 वाहन भगवा ध्वजों से सजाए जाएंगे। 360 वालंटियर गेर की व्यवस्था संभालेंगे।
- टोरी कार्नर: 77वां वर्ष, पांच टैंकरों में छह मिसाइलों से पानी और रंग उड़ाया जाएगा। 150 फीट तक रंग पहुंचेगा।
- मारल क्लब: 52वां वर्ष, गुलाल बरसाने वाली मशीनों को तोप का रूप दिया गया। पानी के टैंकर भी शामिल होंगे।
- हिंद रक्षक फाग यात्रा: 28वां वर्ष, महाकाल मंदिर की प्रतिकृति में महाकाल दर्शन। मातृशक्तियां भगवान के रथ को खींचेंगी।
यूनेस्को फोकस: अगर इसे सूचीबद्ध किया गया, तो यह सिर्फ शहर की पहचान नहीं, बल्कि विश्व स्तर पर सांस्कृतिक विरासत की मान्यता बन जाएगी।
गेर का इतिहास
आधुनिक गेर की शुरुआत 1948 में बाबूलाल गिरी ने टोरी कॉर्नर से की थी। उस समय केवल 500–700 लोग शामिल होते थे। अब यह लाखों लोगों तक पहुंच चुका है। पहले हाथी‑घोड़ों का इस्तेमाल होता था, लेकिन पशुओं के उपयोग पर रोक लगने के बाद गेर पूरी तरह मशीनों, कलर ब्लोअर और हाईटेक सिस्टम से सजाई गई है।

भीड़ और उत्साह
गेर वाले दिन राजवाड़ा का दृश्य रंगों से जगमगाता है। रंग‑भरी तोपें, गुलाल के बादल, फूलों की बारिश और पानी की बौछारें पूरे शहर को उत्सव में डुबो देती हैं। इस बार करीब 5 लाख लोग इसमें शामिल हो सकते हैं, जिसमें स्थानीय लोग और विदेशी पर्यटक भी शामिल हैं।











