PU Special :आंखो देखी-इंदौर के कैलाश-मानसरोवर यात्री ओम द्विवेदी ने बताया, 'पहाड़ से मौत तो तब भी गिर रही थी, जब हम लौटे थे'

नेपाल में बाढ़ त्रासदी से सैकडों लोगों अचानक काल के गाल में समा गए। हजारों लोगों से अब भी संपर्क नहीं हो पा रहा है। इनमें भारत के भी कई लोग हैं। दरअसल, नेपाल में प्राकृतिक आपदा से  पहले भी प्रकृति ने डरावने दृश्य दिखाए थे। इंदौर के कैलाश-मानसरोवर यात्री ओम  द्विवेदी ने बताया कि पहाड़ों का गिरना पहले ही शुरू हो गया था।
आंखो देखी-इंदौर के कैलाश-मानसरोवर यात्री ओम द्विवेदी ने बताया, 'पहाड़ से मौत तो तब भी गिर रही थी, जब हम लौटे थे'
ओम द्विवेदी, कैलाश-मानसरोवर यात्री

इंदौर के कैलाश-मानसरोवर यात्री ओम द्विवेदी ने अपनी यात्रा के दौरान नेपाल का अनुभव पीपुल्स समाचार के साथ साझा किया। उन्होंने बताया कि तिब्बत-नेपाल सीमा पर प्रकृति के खतरनाक स्वरूप को देखा जा चुका था। उन्होंने यात्रा के दौरान जो देखा, पढ़िए उनके ही शब्दों में-

‘12 अगस्त को जब काठमांडू से तिब्बत-नेपाल की सीमा रसुआगढ़ी पहुंचे थे, तब सपने में भी उम्मीद नहीं थी कि लौटना एक नई जिंदगी जैसा होगा। जाते-आते जिन होटलों में रात बिताई थी, जिन रेस्तरां में खाना खाया था, जिस इमिग्रेशन सेंटर में भारतीय होने की पहचान कराई थी, कौन जानता था कि कुछ दिनों बाद ही उनके निशान भी न मिलेंगे। जाते हुए जिस त्रिशूली और भोटेकोशी नदी की खूबसूरती पर मंत्रमुग्ध थे, जिन  पहाड़ों की ऊंचाई और हरियाली देखकर आंखे मुस्कुराती रहती थीं, कुछ दिनों बाद वहीं से प्रलय उतरेगी और इंसानी बस्ती को निगल जाएगी। कैलाश-मानसरोवर की ओर भागती हुई कई-कई आस्थाएं सहसा काल के गाल में समा जाएंगी।’

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ऊपर से गिर रहे पत्थर की दिशा बदली तब जान में जान आई

‘मुश्किलें तो तब भी थीं, जब हम लौटे थे। पहाड़ गिर रहे थे और कुछ किमी तक की सड़क ध्वस्त हो गई थी। उस इलाके को पार करते हुए एक पत्थर मेरी ओर भी गिरा था। मेरे 23 साथियों की सांसें थम-सी गई थीं। ऊपर से गिरते पत्थर की दिशा बदली और वह नीचे नदी में चला गया। जान में जान आई। हमने वह हिस्सा पार किया। तीन दिन बाद तबाही का जो मंजर है, उसके बारे में सोचकर ही दिल बैठ जाता है। जिन जगहों पर रहकर अभी-अभी हम आए हैं, उन्हीं जगहों पर रहते हुए हमारी ही तरह के कितने लोग सैलाब में बह गए होंगे। कितनी ही जिंदगियों ने मौत का लिबास पहन लिया होगा। कैलाश दर्शन की स्मृतियों में विनाश के यह किस्से हमेशा ही सिसकियां बनकर दर्ज रहेंगे। अब जब हम सुरक्षित हैं, नेपाली गाइड की हिदायत बार-बार याद आती है-“पहाड़ गिर रहा है, पत्थर मौत की शक्ल में नीचे आ रहे हैं, एक-एककर यहां से आगे बढ़ें,रुके तो कुछ भी हो सकता है।’

ओम द्विवेदी, कैलाश-मानसरोवर यात्री

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Naresh Bhagoria
By Naresh Bhagoria

नरेश भगोरिया। 27 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हूं। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्ववि...Read More

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