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INDORE:इस्कॉन मंदिर में ‘ज्वर अनुष्ठान’ में डूबे भगवान जगन्नाथ, 15 दिन तक बंद रहते हैं दर्शन, चढ़ा तेज बुखार

इंदौर स्थित ISKCON मंदिर में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा को स्नान पूर्णिमा के बाद पारंपरिक रूप से ‘ज्वर’ आने की मान्यता के तहत अनसर काल में रखा गया है। इस दौरान मंदिर में दर्शन बंद हैं और पुजारी विशेष सेवा के तहत आयुर्वेदिक काढ़ा, हल्का भोजन और विश्राम कराकर रथयात्रा की तैयारी कर रहे हैं।
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इस्कॉन मंदिर में ‘ज्वर अनुष्ठान’ में डूबे भगवान जगन्नाथ, 15 दिन तक बंद रहते हैं दर्शन, चढ़ा तेज बुखार
फाइल फोटो

इंदौर। शहर के इस्कॉन मंदिर में इन दिनों एक खास धार्मिक परंपरा का पालन किया जा रहा है, जिसमें Bhagwan Jagannath, बलभद्र और सुभद्रा को स्नान पूर्णिमा के बाद अस्वस्थ माना जाता है। इसी मान्यता के चलते मंदिर के गर्भगृह के दरवाजे आम श्रद्धालुओं के लिए बंद कर दिए गए हैं। पुजारी पूरी श्रद्धा और सेवा भाव से भगवान की देखभाल में जुटे हुए हैं। मंदिर परिसर में भक्ति का माहौल है, लेकिन दर्शन न मिलने के कारण भक्त थोड़े निराश भी हैं और भगवान के जल्द स्वस्थ होने की प्रार्थना कर रहे हैं।

15 दिन का अनसर काल

इस्कॉन मंदिर में स्नान पूर्णिमा के बाद शुरू होने वाला अनसर काल एक पुरानी परंपरा का हिस्सा है। मान्यता है कि इस दिन भगवान को 108 पवित्र नदियों और तीर्थों के जल से स्नान कराया जाता है। इसके बाद अत्यधिक स्नान के कारण भगवान को ‘ज्वर’ आ जाता है और वे विश्राम में चले जाते हैं। इस अवधि में भव्य श्रृंगार और राजसी पूजा नहीं होती बल्कि सादगी और सेवा पर जोर दिया जाता है। मंदिर में इस समय केवल पुजारियों को ही गर्भगृह में प्रवेश मिलता है।

थर्मामीटर से सेवा

इस परंपरा में एक दिलचस्प पहल यह भी है कि भगवान के स्वास्थ्य की देखभाल में प्रतीकात्मक रूप से थर्मामीटर का उपयोग किया जाता है। पुजारी मानो एक डॉक्टर की तरह भगवान का तापमान जांचते हैं और उनकी स्थिति का ध्यान रखते हैं। यह दृश्य भक्तों के लिए आस्था और भावनाओं से भरा होता है। भले ही यह एक धार्मिक प्रतीक हो लेकिन इससे भक्तों की भावनात्मक जुड़ाव और गहरा हो जाता है।

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आयुर्वेदिक काढ़ा और हल्का भोग

भगवान के लिए इस अवधि में विशेष आयुर्वेदिक काढ़ा तैयार किया जाता है जिसमें अदरक, तुलसी, काली मिर्च, लौंग, दालचीनी, सोंठ और शहद जैसी औषधियां शामिल होती हैं। इसके साथ भगवान को खिचड़ी और हल्का सात्विक भोजन अर्पित किया जाता है। पुजारी मानते हैं कि यह सेवा भगवान के स्वास्थ्य लाभ का प्रतीक है और इससे अनसर काल की परंपरा पूरी होती है। भारी श्रृंगार और रेशमी वस्त्रों की जगह हल्के सूती वस्त्र ही पहनाए जाते हैं।

भक्तों की श्रद्धा और बाहर से दर्शन की आस्था

मंदिर के गर्भगृह के दरवाजे बंद हैं लेकिन भक्त बाहर से ही भगवान को नमन कर रहे हैं। कई श्रद्धालु मंदिर परिसर में आकर प्रार्थना कर रहे हैं कि भगवान जल्द स्वस्थ हों और रथयात्रा के दिन फिर से दर्शन दें। भक्तों की भावनाएं इस समय और अधिक गहरी हो जाती हैं क्योंकि वे प्रत्यक्ष दर्शन नहीं कर पाते लेकिन आस्था कम नहीं होती।

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रथयात्रा की तैयारी और अगले उत्सव की प्रतीक्षा

मंदिर प्रशासन के अनुसार यह विश्राम काल लगभग 15 दिनों तक चलता है। इसके बाद भगवान का पुनः भव्य श्रृंगार किया जाएगा और रथयात्रा के अवसर पर उन्हें भक्तों के बीच लाया जाएगा। इस दिन को लेकर भक्तों में विशेष उत्साह रहता है। माना जाता है कि यह परंपरा पुरी की सदियों पुरानी परंपरा का ही विस्तार है, जिसे देशभर के इस्कॉन मंदिरों में श्रद्धा के साथ निभाया जाता है।

Aditi Rawat
By Aditi Rawat

अदिति रावत | MCU, भोपाल से M.Sc.(न्यू मीडिया टेक्नॉलजी) | एंकर, न्यूज़ एक्ज़िक्यूटिव की जिम्मेदारिय...Read More

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