चिप्स-बिस्किट से साबुन तक सब महंगा!क्या होता है पाम ऑयल... जिसके दाम बढ़ने से हर घर पर पड़ेगा असर

पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों की चिंता के बीच अब एक और बड़ा खतरा धीरे-धीरे हमारे घरों तक पहुंच रहा है… पाम ऑयल का संकट। यह वही तेल है जो सिर्फ किचन तक सीमित नहीं, बल्कि बिस्किट, चिप्स, नमकीन से लेकर साबुन-शैंपू तक हर रोज इस्तेमाल होने वाली चीजों में शामिल है। यानी बात सिर्फ खाने के तेल की नहीं है, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी की है।
अब हालात ऐसे बन रहे हैं कि पाम ऑयल महंगा हुआ तो असर हर घर पर दिखेगा रसोई का बजट बिगड़ेगा, बाजार की चीजें महंगी होंगी और जेब पर बोझ बढ़ेगा। सवाल यह है कि आखिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि पाम ऑयल भी संकट में आ गया?
पाम ऑयल क्या होता है और कैसे बनता है?
पाम ऑयल एक वनस्पति तेल है, जो ऑयल पाम (Elaeis guineensis) के फलों से निकाला जाता है। यह दुनिया के सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले खाद्य तेलों में से एक है। पाम के पेड़ों पर गुच्छों में लगने वाले छोटे-छोटे फलों से यह तेल तैयार किया जाता है।
इसकी प्रोसेसिंग एक तय औद्योगिक प्रक्रिया के तहत होती है। सबसे पहले पाम फलों की कटाई की जाती है, फिर उन्हें भाप से उबाला जाता है ताकि उनमें मौजूद एंजाइम निष्क्रिय हो जाएं। इसके बाद मशीनों से फलों को दबाकर उनका गूदा और तेल अलग किया जाता है। इस कच्चे तेल को आगे रिफाइनिंग प्रक्रिया से गुजारा जाता है, जिसमें गंध, रंग और अशुद्धियों को हटाकर इसे उपयोग के लिए तैयार किया जाता है।
पाम ऑयल की खासियत यह है कि यह लंबे समय तक खराब नहीं होता और उच्च तापमान पर भी स्थिर रहता है, इसलिए यह डीप फ्राई के लिए सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है।

भारत की पाम ऑयल पर निर्भरता
भारत दुनिया का सबसे बड़ा पाम ऑयल आयातक देश है। देश में हर साल लगभग 95 लाख टन पाम ऑयल की खपत होती है, जबकि घरेलू उत्पादन 4 लाख टन से भी कम है। इसका मतलब है कि, भारत अपनी जरूरत का 90 प्रतिशत से ज्यादा पाम ऑयल विदेशों से मंगाता है। भारत ज्यादातर पाम ऑयल इंडोनेशिया और मलेशिया से मंगाता है। इन दोनों देशों में अनुकूल जलवायु ज्यादा बारिश और गर्म मौसम के कारण पाम की खेती बड़े पैमाने पर होती है।
भारत में पाम ऑयल की इतनी बड़ी खपत का कारण इसका सस्ता होना है। अन्य खाद्य तेलों की तुलना में यह कम कीमत में उपलब्ध होता है और बड़े पैमाने पर सप्लाई किया जा सकता है।
रोजमर्रा की जिंदगी में पाम ऑयल की भूमिका
पाम ऑयल का इस्तेमाल सिर्फ खाना बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आधुनिक उपभोक्ता अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा बन चुका है। फूड इंडस्ट्री में इसका सबसे ज्यादा इस्तेमाल होता है। बिस्किट, केक, कुकीज़, चिप्स, नमकीन, इंस्टेंट नूडल्स, चॉकलेट, आइसक्रीम और रेडी-टू-ईट फूड जैसी लगभग हर पैक्ड चीज में पाम ऑयल या उससे बने तत्व मौजूद होते हैं। होटल, रेस्त्रां और स्ट्रीट फूड विक्रेता भी डीप फ्राई के लिए बड़े पैमाने पर इसी तेल का इस्तेमाल करते हैं।
इसके अलावा पर्सनल केयर और FMCG सेक्टर में भी इसकी अहम भूमिका है। साबुन, शैंपू, डिटर्जेंट, क्रीम, लोशन, लिपस्टिक और टूथपेस्ट तक में पाम ऑयल या उसके डेरिवेटिव्स का उपयोग होता है। यही वजह है कि, इसकी कीमतों में हलचल का असर सीधे आम उपभोक्ता पर पड़ता है।

ईरान युद्ध से पाम ऑयल संकट कैसे जुड़ा?
पहली नजर में यह समझना मुश्किल लगता है कि, ईरान युद्ध का पाम ऑयल से क्या संबंध है, क्योंकि पाम ऑयल का उत्पादन मुख्य रूप से दक्षिण-पूर्व एशिया में होता है। लेकिन असल में यह पूरी तरह से वैश्विक ऊर्जा बाजार से जुड़ा हुआ मामला है। ईरान में तनाव और स्ट्रेट ऑफ होर्मुड में अनिश्चितता के कारण कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई है। इससे कई देशों के सामने ऊर्जा सुरक्षा का सवाल खड़ा हो गया है।
इसी के चलते दुनिया के सबसे बड़े पाम ऑयल उत्पादक इंडोनेशिया ने एक बड़ा फैसला लिया है। इंडोनेशिया ने डीजल में पाम ऑयल की मिलावट बढ़ाने की नीति अपनाई है। पहले वहां B40 यानी 40 प्रतिशत पाम ऑयल मिलाकर डीजल बनाया जाता था, जिसे अब बढ़ाकर B50 करने की योजना है।
इसका सीधा मतलब है कि, इंडोनेशिया अपने पाम ऑयल का बड़ा हिस्सा निर्यात करने के बजाय घरेलू बायोडीजल बनाने में इस्तेमाल करेगा। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में उपलब्ध पाम ऑयल की मात्रा कम हो जाएगी।
वैश्विक सप्लाई पर असर और भारत की चुनौती
इंडोनेशिया के इस फैसले से अनुमान है कि वैश्विक बाजार में हर साल 15 से 20 लाख टन पाम ऑयल की कमी हो सकती है। इसके अलावा मलेशिया भी धीरे-धीरे अपने बायोडीजल कार्यक्रम को बढ़ा रहा है, जिससे सप्लाई और घटने की आशंका है।
भारत जैसे देश, जो आयात पर अत्यधिक निर्भर हैं, इस स्थिति से सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे। पहले ही कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण शिपिंग लागत बढ़ चुकी है और अब सप्लाई में कमी से कीमतों पर और दबाव पड़ सकता है।

भारत में महंगाई का नया खतरा
पाम ऑयल की कीमतों में बढ़तरी का असर केवल खाने के तेल तक सीमित नहीं रहेगा। इससे जुड़ी पूरी सप्लाई चेन प्रभावित होगी। खाने के तेल की कीमतों में बढ़ोतरी के साथ-साथ बिस्किट, नमकीन, चिप्स, बेकरी प्रोडक्ट्स और मिठाइयों के दाम भी बढ़ सकते हैं। Parle और Britannia जैसी कंपनियों के लिए लागत बढ़ने का दबाव बन सकता है।
इसके अलावा साबुन, शैंपू, डिटर्जेंट और कॉस्मेटिक्स जैसे FMCG प्रोडक्ट्स भी महंगे हो सकते हैं। Hindustan Unilever और Godrej Consumer Products जैसी बड़ी कंपनियों को भी लागत बढ़ने का असर झेलना पड़ सकता है।

कितनी लंबी हो सकती है समस्या
अगर यह स्थिति अगले 3 से 6 महीनों तक बनी रहती है, तो भारत में पाम ऑयल और उससे जुड़े उत्पादों की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है। इससे महंगाई पर दबाव बढ़ेगा और आम आदमी की जेब पर सीधा असर पड़ेगा।
सरकार और कंपनियां फिलहाल स्टॉक बढ़ाने और वैकल्पिक स्रोतों की तलाश में जुटी हैं, लेकिन वैश्विक हालात सामान्य होने तक स्थिति में सुधार मुश्किल नजर आता है।











