बिना क्रू के 1500 KM चला ‘मातंगी’, इंसान को उड़ाता है ‘वरुणा’ ड्रोन; जानें भारत की 3 स्वदेशी तकनीकें

भारत रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में लगातार काम कर रहा है। अब आधुनिक तकनीक की मदद से ऐसे मानवरहित सिस्टम विकसित किए जा रहे हैं, जो समुद्र में बिना चालक के सफर कर सकते हैं और हवा में सामान या व्यक्ति को ले जाने की क्षमता रखते हैं। इसी कड़ी में मातंगी ऑटोनॉमस सरफेस वेसल, वरुणा पैसेंजर ड्रोन और कलाम लैब्स का हाई-एल्टीट्यूड UAV चर्चा में हैं। इन तकनीकों की खासियत सिर्फ इनका स्वदेशी विकास नहीं, बल्कि उन कामों की संभावनाएं भी हैं जिन्हें भविष्य में इंसानों की जान जोखिम में डाले बिना या कम मानवीय हस्तक्षेप के साथ पूरा किया जा सकता है।
बिना क्रू के मुंबई से तूतीकोरिन तक 1,500 किलोमीटर का सफर
मातंगी एक ऑटोनॉमस सरफेस वेसल (ASV) है। इसे सागर डिफेंस इंजीनियरिंग और भारतीय नौसेना की WESEE इकाई के सहयोग से विकसित किया गया। अक्टूबर 2024 में इसे ‘सागरमाला परिक्रमा’ अभियान के तहत मुंबई से तमिलनाडु के तूतीकोरिन तक समुद्री यात्रा के लिए रवाना किया गया था। इसने लगभग 1,500 किलोमीटर का सफर स्वायत्त मोड में पूरा किया।
मातंगी की प्रमुख खूबियां
- बिना चालक समुद्री यात्रा: पोत पर किसी क्रू के सवार हुए बिना सफर पूरा करने की क्षमता प्रदर्शित की गई।
- स्वदेशी नेविगेशन तकनीक: समुद्र में रास्ता तय करने के लिए विकसित नेविगेशन सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल किया गया।
- टक्कर से बचने की तकनीक: आसपास की परिस्थितियों को ध्यान में रखकर सुरक्षित रास्ता चुनने में मदद करने वाली प्रणाली शामिल है।
- समुद्री निगरानी की संभावनाएं: भविष्य में ऐसे पोत निगरानी, समुद्री डेटा जुटाने और अन्य मानवरहित अभियानों में उपयोगी हो सकते हैं।
इंसान को हवा में ले जाने वाली स्वदेशी तकनीक
वरुणा एक पायलटलेस एरियल व्हीकल यानी ऐसा हवाई प्लेटफॉर्म है, जिसे व्यक्ति या सामान को ले जाने के उद्देश्य से विकसित किया गया। इसे पुणे की सागर डिफेंस इंजीनियरिंग ने तैयार किया और जुलाई 2022 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने इसका प्रदर्शन किया गया था।
वरुणा ड्रोन की खासियत क्या है?
- पेलोड क्षमता: प्रकाशित रिपोर्टों में इसकी क्षमता लगभग 130 किलोग्राम बताई गई है। यह आंकड़ा 150 किलोग्राम के दावे से अलग है।
- ऑटोनॉमस उड़ान: इसमें स्वचालित उड़ान और लैंडिंग से जुड़ी तकनीक विकसित की गई है।
- जहाजों के बीच सामान पहुंचाने की संभावना: नौसेना के जहाजों तक जरूरी सामान पहुंचाने जैसे कामों में इसका उपयोग किया जा सकता है।
- आपातकालीन सहायता: भविष्य में उपयुक्त परीक्षण, सुरक्षा मंजूरी और संचालन व्यवस्था के साथ मेडिकल इवैक्युएशन जैसे कामों में भी ऐसे प्लेटफॉर्म उपयोगी हो सकते हैं।
1.18 लाख फीट से लॉन्च करने की अवधारणा
भारत में हाई-एल्टीट्यूड ड्रोन तकनीक पर भी काम हो रहा है। एयरोस्पेस स्टार्टअप कलाम लैब्स ने स्ट्रैटोस्फेरिक UAV से जुड़ी ऐसी अवधारणाएं प्रदर्शित की हैं, जिनमें बैलून आधारित प्लेटफॉर्म की मदद से विमान को बेहद ऊंचाई तक ले जाकर छोड़ा जा सकता है। कंपनी ने 1,18,000 फीट से अधिक ऊंचाई से लॉन्च किए जाने वाले UAV का प्रदर्शन भी सार्वजनिक किया है।
लॉन्च करने का फायदा क्या हो सकता है?
- ऊंचाई का लाभ: विमान को पहले बैलून से ऊपर ले जाने के बाद उसकी उड़ान शुरू की जा सकती है।
- विशेष मिशनों की संभावना: हाई-एल्टीट्यूड प्लेटफॉर्म का उपयोग मिशन के डिजाइन के अनुसार निगरानी या अन्य रक्षा भूमिकाओं में किया जा सकता है।
- स्वायत्त संचालन: आधुनिक नेविगेशन और फ्लाइट-कंट्रोल तकनीक विमान को तय मार्ग पर संचालित करने में मदद कर सकती है।
- स्वदेशी एयरोस्पेस विकास: ऐसे प्रयोग भारत में विमान डिजाइन, नियंत्रण प्रणालियों और ऊंचाई पर उड़ान से जुड़ी तकनीकी क्षमता विकसित करने में योगदान दे सकते हैं।
भारत के लिए क्यों अहम हैं ये तीनों तकनीकें?
मातंगी, वरुणा और हाई-एल्टीट्यूड UAV तीन अलग क्षेत्रों की तकनीकें हैं, लेकिन इनका विकास एक बड़े बदलाव की ओर इशारा करता है। कुछ खतरनाक या कठिन अभियानों में मानवरहित प्रणालियां उपयोगी हो सकती हैं। घरेलू कंपनियों और रक्षा संस्थानों के बीच सहयोग से डिजाइन और निर्माण की क्षमता विकसित होती है। समुद्र और हवा के रास्ते जरूरी सामान पहुंचाने के नए विकल्प तैयार हो सकते हैं। स्वायत्त नेविगेशन, सेंसर, फ्लाइट कंट्रोल और टक्कर से बचने जैसी तकनीकों में विशेषज्ञता बढ़ती है।



















