भारत सरकार का बड़ा फैसला:जबरन मजदूरी से बने सामान के आयात पर लगेगी रोक, क्या है नई नीति?

विदेश व्यापार महानिदेशालय (DGFT) ने नई अधिसूचना जारी कर Foreign Trade Policy में पैरा 2.20B जोड़ा है। इस नए नियम के तहत अगर जांच में यह साबित होता है कि किसी उत्पाद को बनाने में पूरी तरह या कुछ हिस्से में जबरन मजदूरी कराई गई है, तो केंद्र सरकार उस उत्पाद को अधिसूचित कर उसके आयात पर प्रतिबंध लगा सकती है। यानी अब ऐसे सामान को भारत में आने से रोका जा सकेगा।
जबरन मजदूरी की पहली बार तय हुई परिभाषा
इस नई अधिसूचना की खास बात यह है कि पहली बार जबरन मजदूरी की आधिकारिक परिभाषा भी दी गई है। इसके लिए अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के Forced Labour Convention, 1930 का आधार लिया गया है। इसके अनुसार अगर किसी व्यक्ति से उसकी इच्छा के खिलाफ, डर दिखाकर, धमकी देकर या किसी तरह का दबाव बनाकर काम कराया जाता है, तो उसे जबरन मजदूरी माना जाएगा। अब ऐसे मामलों की कानूनी जांच भी की जा सकेगी।
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किसी एक देश को निशाना नहीं बनाया गया
सरकार ने साफ किया है कि यह नियम किसी एक देश, कंपनी या किसी खास उत्पाद को ध्यान में रखकर नहीं बनाया गया है। अधिसूचना में कहीं भी किसी देश का नाम नहीं लिया गया है। इसका मतलब यह है कि भविष्य में अगर दुनिया के किसी भी देश से आने वाले किसी सामान के निर्माण में जबरन मजदूरी का इस्तेमाल साबित होता है, तो भारत उसके आयात पर रोक लगा सकता है।
क्यों होती है चीन के शिनजियांग की चर्चा?
हालांकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सबसे ज्यादा चर्चा चीन के शिनजियांग (Xinjiang) क्षेत्र में बनने वाले कुछ उत्पादों को लेकर होती रही है। अमेरिका, संयुक्त राष्ट्र के कुछ विशेषज्ञों और कई मानवाधिकार संगठनों का आरोप है कि वहां उइगर मुस्लिम समुदाय और अन्य अल्पसंख्यकों से जबरन मजदूरी कराई जाती है। वहीं चीन लगातार इन आरोपों से इनकार करता आया है और उन्हें गलत बताता है।
दुनिया के कई देश पहले ही उठा चुके हैं ऐसे कदम
भारत से पहले दुनिया की कई बड़ी अर्थव्यवस्थाएं इस दिशा में सख्त फैसले ले चुकी हैं। अमेरिका ने Uyghur Forced Labor Prevention Act (UFLPA) लागू कर शिनजियांग से जुड़े कई उत्पादों के आयात पर कड़े नियम बनाए हैं। वहीं यूरोपीय संघ (EU) ने भी ऐसे उत्पादों को अपने बाजार से बाहर रखने के लिए नया नियम तैयार किया है। इसके अलावा कनाडा और कई विकसित देशों ने भी सप्लाई चेन में मानवाधिकारों के पालन को जरूरी बना दिया है।
भारत के लिए क्यों अहम है यह फैसला?
भारत ऐसे समय यह कदम उठा रहा है, जब वह खुद को दुनिया का बड़ा मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने की कोशिश कर रहा है। इसके साथ ही भारत यूरोप, ब्रिटेन और कई अन्य देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर तेजी से काम कर रहा है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय व्यापार के नियमों के मुताबिक चलना भारत के लिए काफी जरूरी हो गया है।
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अब सिर्फ सस्ता सामान ही काफी नहीं
आज के समय में वैश्विक व्यापार सिर्फ कम कीमत और अच्छी गुणवत्ता तक सीमित नहीं है। अब यह भी देखा जाता है कि किसी उत्पाद को बनाने में मजदूरों के अधिकारों का सम्मान किया गया या नहीं। साथ ही सप्लाई चेन कितनी पारदर्शी है, पर्यावरण का कितना ध्यान रखा गया है और कंपनियां सामाजिक जिम्मेदारियों का पालन कर रही हैं या नहीं। इसलिए दुनिया भर में Responsible Trade और ESG Standards को तेजी से अपनाया जा रहा है।
दुनिया के लिए भारत का संदेश
विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव सिर्फ विदेश व्यापार नीति में किया गया एक संशोधन नहीं है। इसके जरिए भारत यह संदेश देना चाहता है कि वह भी वैश्विक व्यापार में ईमानदार और जिम्मेदार कारोबार को बढ़ावा देना चाहता है। इससे भारत की छवि एक भरोसेमंद व्यापारिक साझेदार के रूप में और मजबूत हो सकती है। आने वाले समय में यह फैसला न सिर्फ मानवाधिकारों की रक्षा में मदद करेगा, बल्कि भारतीय व्यापार को अंतरराष्ट्रीय मानकों के और करीब भी ले जाएगा।












