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इजरायल-ईरान युद्ध का असर :एसिड स्लरी की सप्लाई ठप, इंदौर में साबुन-सर्फ का उत्पादन अब आधा

इजरायल-ईरान युद्ध का असर मप्र के उद्योगों पर पड़ रहा है। एसिड स्ल्री की सप्लाई ठप होने से साबुन और सर्फ का उत्पादन आधा हो गया है। कई यूनिट बंद होने की कगार पर पहुंच गई हैं।
एसिड स्लरी की सप्लाई ठप, इंदौर में साबुन-सर्फ का उत्पादन अब आधा
AI जनरेटेड सारांश
    यह सारांश आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस द्वारा तैयार किया गया है और हमारी टीम द्वारा रिव्यू की गई है।

    नवीन यादव, इंदौर। पश्चिम एशिया के तनाव ने अब इंदौर के उद्योगों की रफ्तार थाम दी है। डिटर्जेंट फैक्ट्रियों की लाइफलाइन मानी जाने वाली एसिड स्लरी में उपयोग होने वाले तत्वों की सप्लाई ठप पड़ते ही उत्पादन चरमरा गया है। हालात इतने गंभीर हैं कि कई इकाइयां बंद होने की कगार पर पहुंच गई हैं। जहां प्रतिदिन ढ़ाई क्विंटल सर्फ और करीब 1 क्विंटल साबुन एक यूनिट में बनता था अब उत्पादन घटकर आधे से भी कम रह गया है। हालात ऐसे ही रहे तो शहर की कई यूनिटों में ताले लगाने पड़ सकते हैं। 

    सप्लाई घटने से बिगड़ा उत्पादन 

    सांवेर रोड स्थित एक केमिकल फैक्ट्री की संचालक कांता यादव के अनुसार, डिटर्जेंट निर्माण में एसिड स्लरी सबसे अहम कच्चा माल है। एक किलो सर्फ में औसतन 300 ग्राम तक स्लरी का उपयोग होता है। यह कच्चे तेल से बनने वाला उत्पाद है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय हालात बिगड़ते ही इसकी उपलब्धता और कीमत दोनों प्रभावित होती हैं। फैक्ट्री संचालकों का कहना है कि पहले जहां मांग के अनुसार पर्याप्त सप्लाई मिल जाती थी, अब जरूरत के मुकाबले काफी कम माल मिल रहा है। कई इकाइयां पुराने स्टॉक के सहारे काम चला रही हैं, लेकिन यह राहत सीमित समय तक ही संभव है।

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    एसिड स्लरी का स्रोत

    मप्र में इस्तेमाल होने वाली एसिड स्लरी आमतौर पर राज्य में बड़े पैमाने पर नहीं बनती, बल्कि बाहर से मंगाई जाती है। यह खासकर अहमदाबाद, वडोदरा और अंकलेश्वर के केमिकल हब में इसका उत्पादन होता है। मुंबई और आसपास के औद्योगिक क्षेत्रों से भी सप्लाई आती है। कच्चा माल ईरान और अन्य पश्चिम एशियाई देशों से आता है, जिसे भारत में प्रोसेस कर एसिड स्लरी बनाई जाती है। यही वजह है कि अभी इंडस्ट्री कच्चे माल के संकट से जूझ रही है।

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    पांच हजार से अधिक कर्मचारी कर रहे काम

    कांता यादव के अनुसार इंदौर की फैक्ट्रियों में 10,000 कर्मचारी काम कर रहे होंगे। इनमें छोटी-बड़ी सभी यूनिट शामिल हैं। किसी में 50 तो किसी में 20 कर्मचारी भी मिल जाएंगे।

    आधी क्षमता पर यूनिट्स, बंदी की आशंका

    उद्योग से जुड़े लोगों के मुताबिक, कई फैक्ट्रियों में उत्पादन आधा रह गया है। यदि जल्द नई खेप नहीं पहुंची, तो उत्पादन और घटाना पड़ेगा। स्थिति लंबे समय तक बनी रही तो कुछ इकाइयों के सामने आंशिक या पूर्ण बंदी की नौबत आ सकती है।

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    कई सहयोगी उद्योग भी हो रहे प्रभावित

    इस संकट का असर सिर्फ उद्योग तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे जुड़े श्रमिकों की आजीविका भी प्रभावित हो रही है। एक फैक्ट्री में दर्जनों श्रमिक काम करते हैं और शहर की सभी इकाइयों को मिलाकर बड़ी संख्या में लोगों का रोजगार इससे जुड़ा है।

    कपिल बाथम, प्रोडक्शन हेड वैशाली कैमिकल कंपनी

    Naresh Bhagoria
    By Naresh Bhagoria

    नरेश भगोरिया। 27 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हूं। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्ववि...Read More

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