
जबलपुर/भोपाल। प्रदेश सरकार की राज्य मंत्री प्रतिमा बागरी के जाति प्रमाणपत्र पर सवाल उठाने वाली जनहित याचिका का मप्र हाईकोर्ट ने निराकरण कर दिया है। जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस अवनीन्द्र कुमार सिंह की डिवीजन बेंच ने हाई लेवल स्क्रूटनी कमेटी को कहा है कि वो 60 दिन में इस मामले पर फैसला ले।
हाईकोर्ट ने यह फैसला कांग्रेस के अनुसूचित जाति विभाग के प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप अहिरवार की याचिका पर शुक्रवार को दिया। मामले में आरोप था कि प्रतिमा बागरी के पक्ष में जारी किया गया प्रमाणपत्र फर्जी है। याचिकाकर्ता का दावा था कि महाकौशल, बुंदेलखंड और बघेलखंड ने बागरी जाति राजपूत समुदाय में आती है, जबकि निमाड़ व मालवा क्षेत्र में यह अनुसूचित जाति में शामिल है। ऐसे में प्रतिमा बागरी ने अनुसूचित जाति की न होते हुए भी सतना जिले में अजा वर्ग के लिए आरक्षित सीट से चुनाव लड़ा। इस बारे में राज्य स्तरीय जाति प्रमाणपत्र परीक्षण प्राधिकरण को शिकायत देने के बाद भी 2 माह में कोई कार्रवाई न होने पर यह याचिका दाखिल की गई।
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मामले पर शुक्रवार को हुई सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता मुकेश कुमार अग्रवाल और राज्य सरकार की ओर से शासकीय अधिवक्ता मानस मणि वर्मा ने दलीलें रखीं। सुनवाई के बाद बेंच ने याचिका का निराकरण करते हुए हाई लेवल स्क्रूटनी कमेटी को 60 दिन में उचित आदेश पारित करने के आदेश दिए हैं। अदालत ने यह भी साफ कर दिया कि यदि 30 जून 2026 तक निर्णय नहीं लिया गया, तो याचिकाकर्ता को फिर से याचिका दायर करने की स्वतंत्रता रहेगी।
इस मामले में प्रदीप अहिरवार ने भोपाल में प्रेस वार्ता करते हुए कहा कि मंत्री प्रतिमा बागरी अब महज दो महीने की मंत्री ही शेष बची हुई हैं। उच्च स्तरीय जांच समिति की रिपोर्ट आने के बाद हमें पूरा विश्वास है कि उनका जाति प्रमाण पत्र फर्जी पाया जाएगा और उन्हें मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ेगा। अहिरवार ने कहा कि शिकायत दर्ज होने के 1 साल बाद तक भी जांच पूरी नहीं की गई, जिसके कारण उन्हें मजबूर होकर हाईकोर्ट का रुख करना पड़ा। उनका आरोप है कि राज्य सरकार लगातार अपने मंत्रियों को संरक्षण देते हुए जांच प्रक्रिया को प्रभावित करती रही है।
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