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भोपाल:गैस सिलेंडर की कमी की खबरों से बढ़ी बेचैनी, राजधानी में एंग्जायटी और ऑब्सेसिव बिहेवियर के केस बढ़े

गैस सिलेंडर की संभावित कमी और युद्ध जैसी खबरों का असर अब सिर्फ रसोई तक सीमित नहीं रहा, बल्कि लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी दिखने लगा है। भोपाल में ऐसे मामले सामने आ रहे हैं, जहां सिलेंडर खत्म होने के डर ने लोगों की दिनचर्या और नींद दोनों छीन ली है।
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गैस सिलेंडर की कमी की खबरों से बढ़ी बेचैनी, राजधानी में एंग्जायटी और ऑब्सेसिव बिहेवियर के केस बढ़े
AI जनरेटेड सारांश
    यह सारांश आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस द्वारा तैयार किया गया है और हमारी टीम द्वारा रिव्यू की गई है।

    पल्लवी वाघेला, भोपाल

    गैस सिलेंडर की कमी की खबरों ने भोपाल में कई लोगों के मानसिक संतुलन को प्रभावित किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि डर और अनिश्चितता के माहौल में संतुलित सोच, सीमित खबरें और समय पर सलाह ही एंग्जायटी से बचाव का रास्ता है।

    कई लोग दिन में बार-बार चेक कर रहे सिलेंडर

    सीहोर के नसरुल्लागंज के 35 वर्षीय व्यक्ति को पिछले कुछ समय से यह चिंता सता रही है कि कहीं गैस सिलेंडर अचानक खत्म न हो जाए। सोशल मीडिया पर चल रही कमी और कालाबाजारी की खबरों ने उसकी आशंका को और गहरा कर दिया है। वह दिन में कई बार सिलेंडर की जांच करता है कि कहीं लीक तो नहीं हो रही। धीरे-धीरे यह डर इतना बढ़ा कि उसकी नींद प्रभावित हो गई और वह हर समय तनाव में रहने लगा। इसी तरह कोलार की 42 वर्षीय महिला ने गैस बचाने के नाम पर घर में सख्त पाबंदियां लगा दीं। चाय बनना बंद, खाना गरम करने पर रोक-परिणामस्वरूप परिवार में तनाव और खुद उन्हें घबराहट और अनिद्रा की शिकायत होने लगी।

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    दिमाग का अलार्म सिस्टम हो रहा ओवरएक्टिव

    जेपी अस्पताल के क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. राहुल शर्मा ने बताया कि जब अनिश्चितता का माहौल बनता है, तो दिमाग का अलार्म सिस्टम यानी एमिग्डाला ज्यादा सक्रिय हो जाता है। यह हिस्सा खतरे को बढ़ा-चढ़ाकर महसूस कराता है, जिससे व्यक्ति सामान्य स्थिति को भी आपातकाल जैसा समझने लगता है। बार-बार फाइट या फ्लाइट प्रतिक्रिया ट्रिगर होने से चिंता, घबराहट और ओवरथिंकिंग बढ़ती जाती है। अगर समय रहते इसे नियंत्रित न किया जाए, तो यह एंग्जायटी डिसऑर्डर का रूप ले सकता है।

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    'नकारात्मक खबरों से रहें दूर' 

    साइकियाट्रिस्ट डॉ. सत्यकांत त्रिवेदी का कहना है कि लगातार नकारात्मक खबरें व्यक्ति के सोचने के तरीके को प्रभावित करती हैं। जब डर बार-बार दिमाग में आता है, तो वह व्यवहार को नियंत्रित करने लगता है। ऐसी स्थिति में सूचना के स्रोत सीमित और विश्वसनीय रखने चाहिए। रिलैक्सेशन टेक्निक जैसे गहरी सांस लेना, ध्यान और नियमित दिनचर्या अपनाना मददगार हो सकता है। जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ से परामर्श लेना भी जरूरी है, ताकि स्थिति गंभीर रूप न ले।

    Rohit Sharma
    By Rohit Sharma

    पीपुल्स इंस्टीट्यूट ऑफ मीडिया स्टडीज, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय...Read More

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