जंगल की आग काबू में :पांच साल में प्रभावित वन क्षेत्र में 70 प्रतिशत की कमी, सुरक्षित रहेगी हरियाली

मप्र में सैटेलाइट निगरानी और जनभागीदारी से जंगल में लगने वाली आग की घटनाओं में 70 फीसदी तक की कमी आई है। इससे आग से होने वाला नुकसान का दायरा कम हो गया है और हरियाली सुरक्षित रह रही है।
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पांच साल में प्रभावित वन क्षेत्र में 70 प्रतिशत की कमी, सुरक्षित रहेगी हरियाली
AI जनरेटेड सारांश
    यह सारांश आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस द्वारा तैयार किया गया है और हमारी टीम द्वारा रिव्यू की गई है।

    संतोष चौधरी,भोपाल। मध्यप्रदेश के वनों के लिए राहत भरी खबर है। बीते पांच वर्षों के आंकड़े गवाही दे रहे हैं कि प्रदेश के जंगलों में आगजनी की घटनाओं में न केवल उल्लेखनीय कमी आई है, बल्कि आग से होने वाले नुकसान का दायरा भी सिमट गया है। वर्ष 2021 की तुलना में 2025 तक आगजनी की घटनाओं (फायर पॉइंट्स) में लगभग 50 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है, जबकि प्रभावित वन क्षेत्र में करीब 70 प्रतिशत की कमी आई है। 

    पांच साल पहले थे 54,321 फायर पॉइंट

    वन विभाग के अनुसार, वर्ष 2021 में प्रदेश में 54,321 फायर पॉइंट दर्ज किए गए थे, वहीं 2025 में यह संख्या घटकर 27,151 रह गई। इससे भी अधिक सुधार प्रभावित क्षेत्र में दिखा है। वर्ष 2021 में 24,196 हेक्टेयर जंगल आग की चपेट में आया था, जो 2025 में घटकर मात्र 7,332 हेक्टेयर रह गया। इसका कारण रिस्पॉन्स टाइम  में सुधार होने से नुकसान का दायरा एक-तिहाई से भी कम रह गया है।

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    निगरानी : हर छह घंटे में सैटेलाइट अलर्ट

    वन विभाग (आईटी विंग) के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि इस सफलता के पीछे 'फॉरेस्ट सर्वे आॅफ इंडिया' (एफएसआई) का रियल-टाइम सैटेलाइट सिस्टम है। यह प्रणाली हर छह घंटे में डेटा अपडेट करती है। जंगल में कहीं भी आग सुलगती है, उसका अलर्ट तत्काल संबंधितों के पास पहुंच जाता है।

    चुनौतियां और कारण

    • मानवीय भूल भारी : प्राकृतिक कारणों से ज्यादा मानवीय लापरवाही जिम्मेदार है।
    • महुआ और शहद : ग्रामीण महुआ बीनने के लिए पेड़ के नीचे की सूखी पत्तियां जलाते हैं या मधुमक्खियों को भगाने धुआं करते हैं, जो बड़ी आग हो जाती है।
    • कृषि विस्तार : वन क्षेत्र के पास खेती के लिए जमीन साफ करने के उद्देश्य से भी आग लगाई जाती है।
    • लापरवाही : जलती हुई बीड़ी या सिगरेट फेंकना एक बड़ा कारण है।

    एक्सपर्ट की  राय :  पारिस्थितिकी पर गहरा संकट

    नेशनल सेंटर फॉर ह्यूमन सेटलमेंट्स एंड एनवायरमेंट के वैज्ञानिक प्रदीप नंदी चेतावनी देते हैं कि भले ही जंगलों में आगजनी की घटनाए कम हो रही है। लेकिन  जंगल की आग सीधे तौर पर क्लाइमेट चेंज को बढ़ावा दे रही है। उन्होंने कहा, जंगल कार्बन सोखने के फेफड़े हैं, लेकिन आग लगने से ये क्षमता नष्ट हो जाती है और वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड बढ़ जाती है। इससे न केवल ग्लोबल वॉर्मिंग बढ़ती है, बल्कि जैव विविधता पर भी संकट आता है। छोटे जीव जल जाते हैं और वन्य प्राणी भोजन-पानी की तलाश में पलायन को मजबूर होते हैं, जिससे मानव-द्वंद्व की घटनाएं भी बढ़ती हैं। हालांकि आने वाले दिन वन विभाग के लिए परीक्षा की घड़ी है, क्योंकि अभी तो यह गर्मी की शुरूआत है। आगे गर्मी और तेज होगी।

    रिस्पॉन्स टाइम और निगरानी पर विशेष जोर 

    मध्यप्रदेश के जंगलों में आग लगने की घटनाओं में लगातार कमी आ रही है। निगरानी तंत्र की मजबूती, सैटेलाइट आधारित अलर्ट और जन-जागरूकता अभियानों के समन्वित प्रयास से यह संभव हो पाया है। हम संवेदनशील क्षेत्रों पर विशेष नजर रख रहे हैं।   

    अमित कुमार दुबे, एपीसीसीएफ (संरक्षण)

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    By Naresh Bhagoria

    नरेश भगोरिया। 27 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हूं। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्ववि...Read More

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