पल्लवी वाघेला, भोपाल। डिजिटल दौर में डीपफेक अब सिर्फ सोशल मीडिया तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका असर अदालतों तक पहुंच गया है। मध्यप्रदेश के चार बड़े शहरों में फैमिली कोर्ट में ऐसे 481 मामले लंबित हैं, जहां फोटो और वीडियो जैसे सबूतों को एआई से बना हुआ बताकर खारिज किया जा रहा है।
फैमिली कोर्ट में लंबित मामलों के आंकड़े चौंकाने वाले हैं
इन सभी मामलों में फोटो या वीडियो एविडेंस को “डीपफेक” या एआई जनरेटेड बताकर विवाद बढ़ाया जा रहा है, जिससे सुनवाई लंबी खिंच रही है।
कोर्ट में अब यह आम हो गया है कि जब एक पक्ष सबूत के तौर पर वीडियो या फोटो पेश करता है, तो दूसरा पक्ष उसे फर्जी बताते हुए कह देता है “यह एआई से बनाया गया है।” इस वजह से सही-गलत की पुष्टि करने में समय लगता है और केस लंबे समय तक लंबित हो जाते हैं।
भोपाल फैमिली कोर्ट में एक मामले में पति ने पत्नी के व्यवहार का वीडियो पेश किया। पत्नी ने इसे एआई जनरेटेड बताते हुए कहा कि पति टेक्निकल फील्ड से जुड़ा है, इसलिए ऐसा वीडियो बनाना उसके लिए आसान है। इस कारण मामला उलझ गया।
इंदौर में एक पति ने अपनी बेवफाई छिपाने के लिए वीडियो को डीपफेक बताया। हालांकि पत्नी ने जांच कराकर वीडियो को सही साबित किया, लेकिन इसमें 7 महीने लग गए। तब जाकर उसे भरण-पोषण मिलना शुरू हुआ।
ग्वालियर में एक युवती ने शादी के फोटो पेश कर खुद को पत्नी बताया। पति ने इसे एआई से बना हुआ बताते हुए दावा किया कि उसकी शादी किसी और से हुई है। मामला अभी भी कोर्ट में विचाराधीन है।
काउंसलर शैल अवस्थी के मुताबिक, पहले फोटो या वीडियो को नकारना मुश्किल होता था, लेकिन अब एआई के चलते हर सबूत पर सवाल उठने लगे हैं। इससे काउंसलिंग और फैसले तक पहुंचने में देरी हो रही है और कोर्ट की पेंडेंसी बढ़ रही है।
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डीपफेक तकनीक ने जहां डिजिटल दुनिया को नया रूप दिया है, वहीं अब यह न्याय व्यवस्था के लिए भी चुनौती बनती जा रही है। हर केस में सबूतों की सत्यता जांचने में समय लग रहा है, जिससे पीड़ित पक्ष को भी लंबा इंतजार करना पड़ रहा है।